A lawyer addresses a panel during a public hearing as advocates protest high drug prices.
10 गुना तक Mark-up पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, दवाओं पर 16% Margin की व्यवस्था पर विचार
नई दिल्ली। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कैंसर की दवाओं के wholesale और retail prices के बीच भारी अंतर पर चिंता जताई और कुछ मामलों में करीब दस गुना तक mark-up होने के मुद्दे पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से ऐसी व्यवस्था पर विचार करने को कहा है जिसमें दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत retail margin की सीमा लागू की जा सके। यह फिलहाल अदालत की ओर से विचार के रूप में सामने आया है; इसे तत्काल लागू हो चुका नियम नहीं माना जाना चाहिए।
मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर का इलाज लंबे समय तक चल सकता है और इसमें दवाओं की लागत मरीज के कुल treatment expenditure का बड़ा हिस्सा बन सकती है। यदि किसी दवा की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत में बहुत बड़ा अंतर हो तो इसका सीधा असर परिवार के स्वास्थ्य खर्च पर पड़ता है।
अदालत की चिंता केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है। भारत में medicines की pricing व्यवस्था में कई अलग-अलग स्तर शामिल होते हैं—manufacturer, distributor, wholesaler, retailer और hospital pharmacy। प्रत्येक स्तर पर margin, handling और अन्य charges जुड़ सकते हैं।
Corporate hospitals में मरीजों को अस्पताल की pharmacy से दवाएं खरीदने की स्थिति में कई बार बाजार में उपलब्ध कीमतों की तुलना करना आसान नहीं होता। इसी संदर्भ में अदालत ने medicine pricing और patient affordability के मुद्दे को उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद pharmaceutical और hospital stocks में भी असर दिखाई दिया। कुछ listed hospital companies के शेयरों में बुधवार को गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि बाजार ने संभावित pricing regulation के प्रभाव का आकलन शुरू किया।
हालांकि किसी संभावित margin cap के अंतिम प्रभाव का आकलन अभी जल्दबाजी होगा। दवा उद्योग का पक्ष यह रहा है कि supply chain, research and development, distribution और regulatory compliance की लागत को भी pricing framework में ध्यान में रखना पड़ता है।
दूसरी तरफ मरीजों के लिए सवाल सीधा है—महंगी दवा का वास्तविक बोझ कौन उठाएगा?
यदि दवाओं के retail margins को सीमित किया जाता है तो इससे मरीजों के लिए affordability बढ़ सकती है, लेकिन policy makers को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इससे essential medicines की supply, availability या छोटे distributors की viability प्रभावित न हो।
अदालत की टिप्पणी ने एक व्यापक बहस को सामने ला दिया है—क्या गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमत केवल बाजार की मांग और supply से तय होनी चाहिए या उनमें मजबूत public-interest regulation की जरूरत है?
यह सवाल आने वाले दिनों में सरकार, pharmaceutical industry, hospitals और patient groups के बीच चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
