October 19, 2026
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साइबर ठगी का सबसे खतरनाक चेहरा अब सिर्फ मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित नहीं है। ठग वरिष्ठ नागरिकों की उम्र, भरोसे, बैंकिंग आदतों और सरकारी संस्थाओं के प्रति सम्मान को अपना हथियार बना रहे हैं। कभी पुलिस या जांच एजेंसी बनकर डराया जाता है, कभी बैंक अधिकारी बनकर खाते की जानकारी मांगी जाती है और कभी पेंशन या केवाईसी के नाम पर मोबाइल में खतरनाक ऐप डाउनलोड कराया जाता है। हाल के मामलों ने साफ कर दिया है कि जीवनभर की बचत कुछ मिनटों में खतरे में पड़ सकती है।

वरिष्ठ नागरिकों से ठगी के पांच ताजा मामले

1. लखनऊ में सेवानिवृत्त अधिकारी से 34 लाख रुपये की ठगी

लखनऊ में एक सेवानिवृत्त पुरातत्व अधिकारी को कथित तौर पर साइबर ठगों ने कानून-प्रवर्तन एजेंसी का अधिकारी बनकर निशाना बनाया। उन्हें बताया गया कि उनका नाम एक गंभीर आपराधिक मामले से जुड़ा है और जांच पूरी होने तक उन्हें अपने बैंक खातों की रकम कथित सत्यापन प्रक्रिया के तहत स्थानांतरित करनी होगी। डर और कानूनी कार्रवाई की धमकी के बीच पीड़ित ने करीब 34 लाख रुपये गंवा दिए। यह मामला दिखाता है कि ठग अब केवल बैंकिंग जानकारी नहीं मांगते, बल्कि पहले मानसिक दबाव बनाकर पीड़ित से खुद ही रकम ट्रांसफर करवाते हैं।

2. चार दिन तक डिजिटल गिरफ्तारी में रखकर 52 लाख रुपये उड़ाए

लखनऊ की एक बुजुर्ग महिला को ठगों ने कई दिनों तक वीडियो कॉल और लगातार धमकियों के जरिए अपने नियंत्रण में रखा। खुद को सरकारी या कानून-प्रवर्तन अधिकारी बताने वाले आरोपियों ने कथित मामले में फंसने का डर दिखाया और पैसे को सुरक्षित रखने के नाम पर अलग-अलग खातों में रकम भेजने का दबाव बनाया। महिला ने करीब 52 लाख रुपये गंवा दिए। इस तरह की ठगी में सबसे बड़ा हथियार तकनीक नहीं बल्कि डर होता है। पीड़ित को इतना घबरा दिया जाता है कि वह परिवार के किसी सदस्य से सलाह लेने के बजाय ठगों के निर्देशों का पालन करता रहता है।

3. पेंशन कार्ड के नाम पर एपीके डाउनलोड कराया, 36.39 लाख रुपये निकले

लखनऊ के आशियाना क्षेत्र में एक बुजुर्ग व्यक्ति को पेंशन कार्ड से जुड़ी प्रक्रिया के नाम पर एक मोबाइल फाइल डाउनलोड करने के लिए कहा गया। यह फाइल सामान्य दस्तावेज जैसी दिखाई गई, लेकिन इसके जरिए मोबाइल तक अनधिकृत पहुंच हासिल कर ली गई। इसके बाद तीन बैंक खातों से कुल करीब 36.39 लाख रुपये निकाल लिए गए। यह घटना बताती है कि अनजान लिंक या एपीके फाइल को खोलना कितना खतरनाक हो सकता है। किसी भी सरकारी योजना, पेंशन, बैंक या केवाईसी प्रक्रिया के लिए अनजान व्यक्ति द्वारा भेजी गई मोबाइल फाइल पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

4. मुंबई में डिजिटल गिरफ्तारी के नाम पर 1.12 करोड़ रुपये की ठगी

मुंबई में 68 वर्षीय एक वरिष्ठ नागरिक को कथित तौर पर दूरसंचार विभाग और पुलिस अधिकारी बनकर ठगों ने संपर्क किया। वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज और अदालत से जुड़े कागजों का इस्तेमाल कर उन्हें विश्वास दिलाया गया कि वह गंभीर कानूनी परेशानी में हैं। इसके बाद लंबे समय तक मानसिक दबाव बनाकर उनसे करीब 1.12 करोड़ रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। इस मामले में जांच के दौरान बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी की कथित भूमिका भी सामने आई। इससे यह चिंता और बढ़ती है कि साइबर ठगी अब संगठित नेटवर्क का रूप ले रही है।

5. एईपीएस के जरिए 1.59 लाख रुपये की अनधिकृत निकासी

गुजरात के राजकोट में 68 वर्षीय एक व्यक्ति, जिन्होंने एटीएम तक सक्रिय नहीं कराया था और मुख्य रूप से चेक से बैंकिंग करते थे, उनके खाते से आधार आधारित भुगतान प्रणाली के जरिए करीब 1.59 लाख रुपये की अनधिकृत निकासी हो गई। बाद में उपभोक्ता आयोग ने बैंक को रकम ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पीड़ित ने स्वयं कोई संदिग्ध लिंक खोलने या ओटीपी साझा करने जैसा कदम नहीं उठाया था। इससे पता चलता है कि बैंकिंग धोखाधड़ी केवल मोबाइल लिंक और कॉल तक सीमित नहीं है; पहचान, बायोमेट्रिक और भुगतान प्रणालियों का दुरुपयोग भी संभव है।

बैंकिंग फ्रॉड का बदलता चेहरा

आज बैंकिंग ठगी कई रूपों में सामने आ रही है। फर्जी बैंक अधिकारी खाते को बंद करने या केवाईसी अपडेट करने का डर दिखाते हैं। फर्जी ग्राहक सेवा नंबर लोगों को गलत खाते में भुगतान करा सकते हैं। यूपीआई ठगी में कैशबैक, रिफंड, इनाम या पैसे प्राप्त करने के नाम पर लिंक या क्यूआर कोड भेजे जाते हैं। फर्जी निवेश योजनाएं कम समय में बड़ी कमाई का लालच देती हैं। वहीं डिजिटल गिरफ्तारी जैसी ठगी में पुलिस, सीबीआई, आरबीआई, दूरसंचार विभाग या अदालत के नाम का इस्तेमाल करके भय पैदा किया जाता है।

वरिष्ठ नागरिक अक्सर इसलिए अधिक संवेदनशील होते हैं क्योंकि वे बैंक और सरकारी संस्थाओं के नाम पर जल्दी भरोसा कर सकते हैं। कई लोग डिजिटल बैंकिंग की तकनीकी बारीकियों से पूरी तरह परिचित नहीं होते और ठग इसी कमी का फायदा उठाते हैं।

वरिष्ठ नागरिक इन 12 नियमों को याद रखें

  1. फोन पर कोई डिजिटल गिरफ्तारी नहीं होती। पुलिस या कोई जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर आपको घर में बंद रखने या बैंक खाते की रकम किसी दूसरे खाते में जमा कराने का आदेश नहीं देती।
  2. ओटीपी, यूपीआई पिन, एटीएम पिन और सीवीवी किसी को न बताएं। बैंक कर्मचारी के नाम पर भी नहीं।
  3. अनजान एपीके या मोबाइल फाइल डाउनलोड न करें। पेंशन, केवाईसी, बिजली बिल या बैंक अपडेट के नाम पर भेजी गई फाइल भी संदिग्ध हो सकती है।
  4. क्यूआर कोड स्कैन करके पैसे पाने की जरूरत नहीं होती। भुगतान करने और पैसा प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझें।
  5. फर्जी ग्राहक सेवा से बचें। बैंक का नंबर हमेशा बैंक की आधिकारिक वेबसाइट, पासबुक या कार्ड से ही लें।
  6. जल्दबाजी में कोई बैंकिंग निर्णय न लें। ठग अक्सर कहते हैं कि अभी पैसा नहीं भेजा तो खाता बंद हो जाएगा या गिरफ्तारी हो जाएगी।
  7. वीडियो कॉल पर डराए जाने पर कॉल काट दें। पहले परिवार के सदस्य या विश्वसनीय व्यक्ति को बताएं।
  8. बैंकिंग अलर्ट हमेशा सक्रिय रखें। हर लेनदेन का संदेश ध्यान से पढ़ें।
  9. परिवार में एक भरोसेमंद व्यक्ति को डिजिटल बैंकिंग की जानकारी दें। जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद मिल सके।
  10. बड़ी रकम को एक ही खाते में रखने से बचें। रोजमर्रा के खर्च वाले खाते और बड़ी बचत के बीच अलगाव उपयोगी हो सकता है।
  11. गारंटीड मुनाफे पर भरोसा न करें। निवेश में निश्चित और असाधारण रिटर्न का दावा बड़ा चेतावनी संकेत है।
  12. संदेह होने पर बातचीत रोक दें। किसी अधिकारी का नाम, पद या वर्दी देखकर तुरंत भरोसा न करें; स्वतंत्र माध्यम से सत्यापन करें।

अगर पैसे चले जाएं तो क्या करें?

सबसे जरूरी बात है कि शर्म या डर के कारण चुप न रहें। बैंक को तुरंत सूचित करें और खाते, कार्ड, यूपीआई या संबंधित सुविधा को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में 1930 पर तुरंत शिकायत दर्ज करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग व्यवस्था के माध्यम से भी शिकायत करें। बैंक संदेश, कॉल विवरण, स्क्रीनशॉट, व्हाट्सऐप चैट, संदिग्ध नंबर, लिंक और लेनदेन की जानकारी सुरक्षित रखें। शुरुआती समय में की गई शिकायत रकम को रोकने या आगे के नुकसान को सीमित करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

सबसे बड़ी सुरक्षा है—डर में फैसला न लेना

साइबर ठगों की रणनीति अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनका तरीका अक्सर एक जैसा होता है—डर, लालच और जल्दबाजी। वरिष्ठ नागरिकों के मामले में परिवार की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चों और परिजनों को चाहिए कि वे बुजुर्गों को केवल ऑनलाइन बैंकिंग सिखाने के बजाय यह भी समझाएं कि कब फोन काटना है, कब किसी बात पर भरोसा नहीं करना है और कब तुरंत परिवार को बताना है।

डिजिटल बैंकिंग सुविधा है, खतरा नहीं। खतरा तब बनता है जब हम बिना सत्यापन के किसी व्यक्ति, लिंक, ऐप या संदेश पर भरोसा कर लेते हैं। इसलिए एक बात हमेशा याद रखें—डर में फैसला मत लीजिए। पहले सत्यापन कीजिए, फिर भुगतान कीजिए।

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