नई दिल्ली: साइबर अपराध की अगली बड़ी चुनौती केवल पासवर्ड चोरी नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति की पहचान की नकल हो सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से किसी व्यक्ति की आवाज, चेहरा और बोलने की शैली की नकल कुछ ही डिजिटल सामग्री के आधार पर की जा सकती है। ऐसे में सवाल बदल गया है—“क्या यह आवाज असली है?” से अधिक महत्वपूर्ण सवाल है, “क्या इस आवाज के पीछे वास्तव में वही व्यक्ति है?”
डीपफेक अब केवल मशहूर हस्तियों की समस्या नहीं
भारत सरकार ने 2026 में डीपफेक से जुड़े खतरों के मुकाबले के लिए मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी कानून और डिजिटल मंचों की जवाबदेही पर जोर दिया है। सरकारी जानकारी के अनुसार पहचान की चोरी, किसी और के रूप में प्रस्तुत होकर धोखा देना, निजता का उल्लंघन और अवैध कृत्रिम सामग्री से जुड़े कई अपराध पहले से कानून के दायरे में हैं। सरकार ने डीपफेक पहचानने से जुड़े 13 जिम्मेदार-कृत्रिम-बुद्धिमत्ता परियोजनाओं को भी समर्थन दिया है।
सबसे खतरनाक धोखाधड़ी कहाँ हो सकती है?
कल्पना कीजिए कि किसी कंपनी के प्रमुख की नकली आवाज में वित्त विभाग के कर्मचारी को तत्काल भुगतान का निर्देश मिले। या किसी माता-पिता की आवाज की नकल कर बच्चे से आपात स्थिति बताकर पैसे मंगाए जाएं। किसी बैंक अधिकारी के चेहरे और आवाज की नकल करके वीडियो कॉल पर दस्तावेज मांगे जाएं। इन सभी मामलों में अपराधी की सबसे बड़ी ताकत तकनीक नहीं, बल्कि सामने वाले का विश्वास होगा।
कानून मौजूद है, लेकिन कार्रवाई की गति भी जरूरी
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66C और 66D पहचान की चोरी तथा कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से किसी और के रूप में प्रस्तुत होकर धोखाधड़ी जैसे मामलों में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। निजता और अश्लील कृत्रिम सामग्री से जुड़े मामलों में अन्य कानूनी प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। समस्या यह है कि कृत्रिम सामग्री बहुत तेजी से फैलती है और कानूनी कार्रवाई कई बार सामग्री के व्यापक रूप से प्रसारित होने के बाद शुरू होती है।
डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी कहाँ तक?
किसी मंच पर अवैध कृत्रिम सामग्री की शिकायत मिलने पर समयबद्ध शिकायत निवारण और हटाने की व्यवस्था जरूरी है। लेकिन हर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी सामग्री को अवैध मानना भी सही नहीं होगा। व्यंग्य, पैरोडी, पत्रकारिता, कला और जानबूझकर की गई प्रतिरूपण-आधारित धोखाधड़ी के बीच कानूनी अंतर बनाए रखना आवश्यक है। यही नियमन की सबसे कठिन चुनौती है।
आम नागरिक क्या करे?
केवल आवाज या वीडियो को पहचान का अंतिम प्रमाण न मानें। बड़े वित्तीय लेन-देन से पहले दूसरे माध्यम से पुष्टि करें। परिवार में आपात स्थिति के लिए एक निजी संकेत शब्द तय किया जा सकता है। अनजान वीडियो कॉल पर निजी दस्तावेज साझा न करें। धोखाधड़ी होने पर तुरंत बैंक को सूचना दें और साइबर अपराध की आधिकारिक शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल करें।
CINN विश्लेषण: डीपफेक से मुकाबला केवल तकनीकी पहचान उपकरणों से नहीं होगा। डिजिटल साक्षरता, मंचों की जवाबदेही, तेज जांच और डिजिटल साक्ष्य का सुरक्षित संरक्षण—इन चारों की आवश्यकता होगी। आने वाले समय में “देखा इसलिए सच है” और “सुना इसलिए सच है” जैसी धारणाएं सबसे कमजोर डिजिटल सुरक्षा बन सकती हैं।
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