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चीन का केंद्रीय बैंक लगातार सोने का भंडार बढ़ा रहा है। यह केवल कीमती धातु में निवेश का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच अपनी आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने की रणनीति भी है। भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश सोने की घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। यदि चीन और दूसरे केंद्रीय बैंक लंबे समय तक बड़े पैमाने पर सोना खरीदते रहते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों और भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है—हालांकि इसका असर अपने-आप या तुरंत होना तय नहीं है।
## चीन सोने का भंडार क्यों बढ़ा रहा है?
अल जज़ीरा की 16 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के पीपुल्स बैंक ने सितंबर में लगातार 23वें महीने सोने की खरीद दर्ज की। रिपोर्ट में वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि सितंबर में चीन ने लगभग 23 टन सोना जोड़ा। इससे उसका घोषित स्वर्ण भंडार करीब 2,410 टन हो गया। चीन के आधिकारिक भंडार में सोने की हिस्सेदारी सितंबर के अंत तक लगभग 8.5 प्रतिशत बताई गई, जबकि 2024 के अंत में यह 5.5 प्रतिशत थी।
इस रणनीति के पीछे कई कारण हैं। पहला, चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर निर्भरता का जोखिम कम करना चाहता है। दूसरा, रूस के केंद्रीय बैंक की विदेशी संपत्तियों को 2022 में प्रतिबंधों के बाद फ्रीज किए जाने की घटना ने देशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि विदेश में रखी संपत्तियां संकट के समय हमेशा पूरी तरह उपलब्ध रहेंगी, इसकी गारंटी नहीं है। देश के भीतर रखा सोना किसी दूसरे देश की देनदारी नहीं होता और इस कारण विदेशी प्रतिबंधों के प्रति अपेक्षाकृत कम संवेदनशील हो सकता है।
तीसरा कारण आर्थिक अनिश्चितता है। चीन के संपत्ति बाजार की कमजोरी और शेयर बाजार में अस्थिरता के बीच कुछ घरेलू निवेशक भी सोने को बचत के वैकल्पिक साधन के रूप में देख रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में चीन में सोने के बार और सिक्कों की खरीद पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 28.4 प्रतिशत अधिक रही।
हालांकि, चीन की खरीद को डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व के तत्काल अंत के रूप में देखना सही नहीं होगा। सोना विदेशी मुद्रा की तरह अंतरराष्ट्रीय भुगतान की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि चीन अपने भंडार में विविधता ला रहा है और जोखिम को एक ही परिसंपत्ति या मुद्रा में केंद्रित नहीं रखना चाहता।
## भारत के सोने के आयात पर संभावित असर
### 1. अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने का जोखिम
यदि चीन के साथ पोलैंड और अन्य केंद्रीय बैंक भी लगातार सोना खरीदते हैं, तो वैश्विक बाजार में निवेश और आरक्षित भंडार के लिए सोने की मांग को सहारा मिल सकता है। आपूर्ति तेजी से न बढ़े और मांग मजबूत बनी रहे, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है। लेकिन कीमतों का फैसला सिर्फ चीन की खरीद से नहीं होता। अमेरिकी ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा, युद्ध और अन्य भू-राजनीतिक घटनाएं भी अहम हैं।
उदाहरण के लिए, 16 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रॉयटर्स की बाजार रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय सोना लगभग 4,165 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर था और उस सप्ताह कीमतों में गिरावट की संभावना जताई गई थी। यह दिखाता है कि केंद्रीय बैंकों की खरीद के बावजूद ऊंची अमेरिकी ब्याज दरों और मजबूत डॉलर जैसे कारक कीमतों को नीचे भी खींच सकते हैं।
### 2. भारत का आयात बिल बढ़ सकता है
भारत अपनी सोने की मांग का बड़ा हिस्सा विदेश से खरीदता है। यदि आयात की मात्रा स्थिर रहे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ जाए, तो भारत को उतने ही सोने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे सोने का कुल आयात बिल बढ़ सकता है और देश के व्यापार घाटे तथा चालू खाते के घाटे पर दबाव पड़ सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है: चीन की खरीद से भारत का आयात अपने-आप बढ़ेगा, ऐसा नहीं है। कीमत बढ़ने पर भारतीय उपभोक्ता खरीद टाल सकते हैं, कम मात्रा खरीद सकते हैं या पुराने गहने बदलने की ओर जा सकते हैं। इस स्थिति में आयात की मात्रा घट सकती है, जबकि प्रति ग्राम कीमत अधिक रहने से खर्च फिर भी ऊंचा बना रह सकता है।
### 3. रुपये और घरेलू कीमतों पर दोहरा दबाव
भारत में सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय भाव से तय नहीं होती। डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, आयात शुल्क और अन्य कर, परिवहन लागत तथा घरेलू बाजार में मांग और आपूर्ति भी कीमत को प्रभावित करते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय सोना महंगा हो और इसी समय रुपया कमजोर हो, तो भारतीय खरीदारों के लिए कीमत में दोहरा उछाल आ सकता है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की मई 2026 की भारत संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, सोने पर कुल आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया गया था। रिपोर्ट ने यह भी बताया कि ऊंचे शुल्क से आधिकारिक आयात की लागत बढ़ती है, मांग पर असर पड़ सकता है और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच अंतर बढ़ने पर अनौपचारिक आयात का प्रोत्साहन भी बढ़ सकता है। इसलिए भारत में सोने की अंतिम कीमत पर चीन की खरीद के साथ-साथ घरेलू कर नीति का भी बड़ा प्रभाव होगा।
### 4. आभूषण कारोबार और उपभोक्ताओं पर असर
ऊंची कीमतें शादी-विवाह और त्योहारों के लिए गहने खरीदने वाले परिवारों का बजट बढ़ा सकती हैं। कुछ खरीदार कम वजन के गहने चुन सकते हैं, खरीद टाल सकते हैं या पुराने सोने के बदले नए आभूषण ले सकते हैं। ज्वेलर्स को भी स्टॉक खरीदने, कीमत तय करने और नकदी प्रबंधन में अधिक सावधानी बरतनी पड़ सकती है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में अप्रैल-जून तिमाही की सोने की मांग सालाना आधार पर 6 प्रतिशत घटकर लगभग 131 टन रही। आभूषणों की मांग में 15 प्रतिशत की सालाना गिरावट दर्ज की गई। ऊंची कीमतें और आयात शुल्क इस पर असर डालने वाले कारकों में शामिल थे। ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय मांग कीमतों के प्रति संवेदनशील है, हालांकि शादी, त्योहार और निवेश की जरूरतें मांग को सहारा दे सकती हैं।
## क्या भारत को भी सोने का भंडार बढ़ाना चाहिए?
भारत के लिए केंद्रीय बैंक का सोना एक रणनीतिक संपत्ति है, लेकिन रिजर्व प्रबंधन में संतुलन जरूरी है। भारतीय रिजर्व बैंक को सोने, विदेशी मुद्रा और अन्य सुरक्षित परिसंपत्तियों के बीच ऐसा संतुलन रखना होता है जिससे संकट के समय भुगतान क्षमता बनी रहे और अत्यधिक उतार-चढ़ाव का जोखिम न बढ़े। चीन की रणनीति भारत के लिए विचारणीय उदाहरण है, पर दोनों देशों की आर्थिक जरूरतें, व्यापार संरचना और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति अलग हैं। इसलिए केवल चीन की नकल करना उचित नीति नहीं होगी।
भारत के लिए एक और विकल्प घरेलू स्तर पर उपलब्ध पुराने सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभावी ढंग से लाना है। पारदर्शी गोल्ड-एक्सचेंज व्यवस्था, पुनर्चक्रण, गुणवत्ता जांच और उपभोक्ता विश्वास बढ़ने से कुछ मांग आयातित सोने के बजाय घरेलू पुनर्चक्रित सोने से पूरी हो सकती है। हालांकि, पुराने सोने का पुनर्चक्रण कुल आयात की जरूरत को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता।
चीन की खरीद भारत के लिए चेतावनी है, सीधा कारण नहीं
चीन का लगातार सोना खरीदना वैश्विक वित्तीय जोखिमों के प्रति सतर्कता और भंडार में विविधता लाने की दीर्घकालीन रणनीति का संकेत है। भारत के लिए इसका संभावित असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, आयात बिल, रुपये, आभूषण कारोबार और घरेलू मांग के माध्यम से सामने आ सकता है। लेकिन कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी या भारत का आयात कितना घटेगा, इसका सटीक अनुमान सिर्फ चीन की खरीद देखकर नहीं लगाया जा सकता।
आने वाले महीनों में तीन संकेतों पर नजर रखना उपयोगी होगा: चीन और अन्य केंद्रीय बैंकों की सोना खरीद, अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों की दिशा, तथा भारत में आयात शुल्क और रुपये की चाल। इन्हीं कारकों का संयुक्त प्रभाव तय करेगा कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सोना कितना महंगा होगा और देश का आयात बिल किस दिशा में जाएगा।
