October 20, 2026
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असम के नागांव, गोलाघाट और होजाई जिलों में दो दिन में 1,100 से अधिक परिवारों की बेदखली ने वन संरक्षण, पुराने बसावट दावों, उच्च न्यायालय की कार्यवाही और पुनर्वास पर सवाल खड़े किए हैं।

विशेष रिपोर्ट | CINN

असम में आरक्षित वन भूमि से परिवारों को हटाने की हालिया कार्रवाई ने भूमि अधिकार, वन संरक्षण, प्रशासनिक प्रक्रिया और विस्थापित लोगों के पुनर्वास पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। Scroll की 18 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दो दिन की कार्रवाई में नागांव, गोलाघाट और होजाई जिलों में 1,100 से अधिक परिवारों को बेदखल किया गया। इनमें बड़ी संख्या बंगाली भाषी मुस्लिम परिवारों की बताई गई है। राज्य प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई आरक्षित वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए की गई, जबकि प्रभावित लोगों का दावा है कि उनके परिवार दशकों पहले सरकारी व्यवस्था के तहत वहां बसाए गए थे। दोनों पक्षों के दावों को समझने के लिए भूमि के कानूनी दर्जे, अदालतों में चल रही कार्यवाही और पुनर्वास की स्थिति की पड़ताल आवश्यक है।

दो दिन में कितने परिवार बेदखल हुए?

Scroll की रिपोर्ट के अनुसार, 17 अक्टूबर को तीन जिलों में कुल 547 परिवारों को हटाया गया। इनमें नागांव के 336, होजाई के 152 और गोलाघाट के 59 परिवार शामिल थे। 18 अक्टूबर को नागांव जिले के लुटुमारी लोंगजाप आरक्षित वन क्षेत्र में 500 से अधिक, कुछ रिपोर्टों के अनुसार 600 से अधिक परिवारों के घर गिराए गए। इन आंकड़ों को जोड़कर प्रभावित परिवारों की संख्या 1,100 से अधिक बताई गई है। अलग-अलग रिपोर्टों में दूसरे दिन की संख्या में अंतर है, इसलिए अंतिम प्रशासनिक आंकड़ा जिला-वार आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगा।

कार्रवाई भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच की गई। प्रभावित क्षेत्र में घरों के साथ अन्य ढांचों को भी हटाए जाने की खबरें हैं। निवासियों ने दस से अधिक मस्जिदों के ढहाए जाने का दावा किया। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक धार्मिक ढांचे की कानूनी स्थिति के विवरण की आवश्यकता है; इसे फिलहाल स्थानीय निवासियों के आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

लुटुमारी में रहने वाले परिवारों का क्या कहना है?

प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे इस इलाके में कई दशकों से रह रहे हैं। Scroll से बातचीत में 44 वर्षीय निवासी अब्दुल नूर ने दावा किया कि उनके परिवारों को 1974 में सरकार ने बसाया था। उनके अनुसार, आसपास के जुरिया क्षेत्र के भूमिहीन परिवारों को जमीन दी गई थी और कुछ परिवार वन विभाग के काम में मजदूर के रूप में लगे थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके परिवारों ने बेदखली के खिलाफ गौहाटी उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। ये निवासी का बयान है; जमीन के आवंटन और कब्जे के कानूनी स्वरूप की पुष्टि संबंधित सरकारी अभिलेखों से होनी चाहिए।

प्रभावित लोगों के दावे का केंद्र यह है कि उनकी मौजूदगी केवल हाल में हुए अवैध कब्जे का मामला नहीं, बल्कि पुराने प्रशासनिक और वन-प्रबंधन ढांचे से जुड़ी है। दूसरी ओर, राज्य सरकार की कार्रवाई का आधार यह है कि भूमि आरक्षित वन का हिस्सा है और वहां बसे परिवारों का कब्जा अधिकृत नहीं है। असली कानूनी प्रश्न यह है कि संबंधित भूखंडों की सीमाएं, आरक्षित वन की अधिसूचना, पुराने आवंटन या बसावट के दस्तावेज और प्रत्येक परिवार की स्थिति क्या है।

‘टांग्या’ प्रणाली क्या थी?

इस विवाद में ‘टांग्या’ प्रणाली का उल्लेख महत्वपूर्ण है। यह वन प्रबंधन की एक पुरानी पद्धति थी, जिसमें वन विभाग के साथ काम करने वाले समुदाय पेड़ों के बीच सीमित अवधि तक खाद्य फसलें उगाते थे और साथ ही वनरोपण में योगदान देते थे। भारत के कुछ क्षेत्रों में इस प्रणाली का उपयोग औपनिवेशिक काल से हुआ। वन श्रमिकों और उनके परिवारों की बस्तियां समय के साथ स्थायी रूप ले सकती थीं, लेकिन किसी ऐतिहासिक श्रम व्यवस्था में शामिल होना अपने-आप में भूमि पर वर्तमान कानूनी स्वामित्व या स्थायी अधिकार का प्रमाण नहीं है। इसके लिए संबंधित दस्तावेज और लागू कानून देखना आवश्यक है।

वन श्रमिकों के संगठनों ने पहले यह तर्क दिया था कि लुटुमारी लोंगजाप आरक्षित वन क्षेत्र के चार गांव—कंदरपा लोंगजाप, पदुमोनी, हाटीजुर और नंबर 9 खेरोनी—के निवासियों का इतिहास टांग्या प्रणाली से जुड़ा है। जून 2026 में ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपल ने प्रस्तावित बेदखली रोकने की मांग की थी। संगठन का तर्क था कि इन समुदायों को साधारण अतिक्रमणकारी मानने से पहले उनके ऐतिहासिक संबंध और बसावट के संदर्भ की जांच होनी चाहिए। यह संगठन का पक्ष है; कानूनी स्थिति का निर्धारण अदालत और प्रासंगिक अभिलेखों के आधार पर होगा।

उच्च न्यायालय में भूमि की स्थिति पर सवाल

इस मामले में कानूनी स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है। 7 अप्रैल 2026 के गौहाटी उच्च न्यायालय के एक आदेश में लुटुमाई आरक्षित वन से जुड़े याचिकाकर्ताओं के मामले में अदालत ने राज्य से आरक्षित वन घोषित किए जाने की अधिसूचना और संयुक्त सत्यापन समिति की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखने को कहा था। आदेश में यह भी दर्ज है कि याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि विवादित भूमि आरक्षित वन की सीमा में आती ही नहीं। अदालत ने उस चरण पर वन विभाग को अगली सुनवाई तक संबंधित क्षेत्र में बेदखली की कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था।

इस आदेश को सभी परिवारों के पक्ष में अंतिम फैसला या सभी बेदखलियों पर लागू स्थायी रोक समझना सही नहीं होगा। यह एक विशिष्ट याचिका और उस समय की अंतरिम कार्यवाही से संबंधित था। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बाद में क्या आदेश हुए, रोक किन भूखंडों और याचिकाकर्ताओं पर लागू थी, और प्रशासन ने किस कानूनी प्रक्रिया के तहत अभियान दोबारा शुरू किया। 2026 की कार्रवाई के संबंध में Scroll की रिपोर्ट में एक अधिकारी ने कहा कि पहले के स्थगन आदेश के बाद आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं और मंजूरियां पूरी की गईं। इन दावों की पूरी पुष्टि के लिए नवीनतम न्यायिक आदेश और प्रशासनिक रिकॉर्ड देखना आवश्यक है।

वन संरक्षण बनाम आजीविका और आवास

आरक्षित वन भूमि की रक्षा पर्यावरण, जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई राज्य की वैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा हो सकती है, बशर्ते भूमि का दर्जा स्पष्ट हो और प्रक्रिया कानून के अनुसार अपनाई जाए। लेकिन जब किसी क्षेत्र में परिवार दशकों से रहते हों, बच्चों की शिक्षा, आजीविका, खेती, धार्मिक स्थल और सामाजिक संबंध उसी जगह से जुड़े हों, तब बेदखली का प्रभाव केवल मकान टूटने तक सीमित नहीं रहता। परिवारों को अस्थायी आश्रय, पेयजल, भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की पढ़ाई और रोज़गार तक पहुंच की समस्या हो सकती है।

इसलिए सार्वजनिक नीति में दो प्रश्नों को अलग-अलग देखना चाहिए: क्या भूमि कानूनी रूप से आरक्षित वन है और कब्जा अनधिकृत है; तथा बेदखली के दौरान प्रभावित परिवारों के साथ कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई और उनके पुनर्वास या सहायता की क्या व्यवस्था है। पहले प्रश्न का उत्तर दूसरे को अप्रासंगिक नहीं बनाता। यदि भूमि पर कब्जा अवैध पाया जाता है, तब भी प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता, नोटिस, सुनवाई, न्यायिक आदेशों का अनुपालन और मानवीय जरूरतों की उपेक्षा न होना महत्वपूर्ण है। इसी तरह, लंबे समय से रहने का दावा अपने-आप में वन भूमि पर अधिकार स्थापित नहीं करता।

क्या प्रभावित परिवारों को पुनर्वास मिलेगा?

रिपोर्टों में विस्थापित परिवारों के लिए व्यापक पुनर्वास व्यवस्था की स्पष्ट, विस्तृत जानकारी सामने नहीं आती। इसीलिए प्रशासन से यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने परिवारों की पहचान की गई, कितनों के पास वैकल्पिक आवास है, क्या किसी राहत शिविर या अस्थायी सुविधा की व्यवस्था हुई, और बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा दिव्यांग लोगों की जरूरतों का आकलन कैसे किया गया। यदि परिवारों के पास सरकारी आवंटन, पुराने भूमि रिकॉर्ड, वन विभाग में रोजगार या कर भुगतान से जुड़े दस्तावेज हैं, तो उन्हें दर्ज करने और उनकी जांच की पारदर्शी व्यवस्था भी उपयोगी होगी।

साथ ही, बेदखली और पुनर्वास से संबंधित किसी भी अधिकार का निर्धारण लागू कानून, न्यायालय के आदेश और प्रत्येक परिवार के तथ्यात्मक रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। बिना जांच सभी परिवारों को वैध निवासी या सभी को अतिक्रमणकारी कहना तथ्यात्मक रूप से असावधान होगा।

असम में व्यापक बेदखली अभियान का संदर्भ

Scroll ने सरकारी विभागों और जिला अधिकारियों के आंकड़ों के आधार पर बताया कि असम में पिछले दस वर्षों में लगभग 19,000 परिवारों को सरकारी भूमि से बेदखल किया गया और उनमें बहुसंख्यक मुस्लिम थे। 2025 में भी नागांव के लुटिमारी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चलाया गया था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भूमि, नागरिकता, प्रवासन, वन संरक्षण और समुदायों की पहचान से जुड़े मुद्दे राज्य में लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा हैं। हालांकि, प्रत्येक अभियान के कारण, कानूनी आधार और प्रभावित आबादी का विवरण अलग हो सकता है; इसलिए अलग-अलग घटनाओं को एक ही कानूनी श्रेणी में रख देना उचित नहीं होगा।

असम में बंगाली भाषी मुस्लिम समुदायों की ऐतिहासिक मौजूदगी, भूमि पर दावे और नागरिकता को लेकर सार्वजनिक बहस संवेदनशील है। रिपोर्टिंग में धार्मिक पहचान को छिपाना भी उचित नहीं, यदि प्रभावित समूह की पहचान घटना को समझने के लिए प्रासंगिक हो; लेकिन केवल धर्म के आधार पर किसी प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य तय करना भी पर्याप्त साक्ष्य के बिना सही नहीं होगा। इसके लिए आधिकारिक आदेश, चयन के मानदंड, भूमि रिकॉर्ड और तुलनात्मक आंकड़ों की जांच जरूरी है।

प्रशासन से उठने वाले अहम सवाल

  • लुटुमारी लोंगजाप आरक्षित वन की अधिसूचना, सीमांकन और संयुक्त सत्यापन रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है या नहीं?
  • 1974 में परिवारों को बसाए जाने के दावे की जांच के लिए कौन-से सरकारी अभिलेख उपलब्ध हैं?
  • क्या बेदखली से पहले प्रत्येक परिवार को व्यक्तिगत नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया?
  • गौहाटी उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों और बाद की कार्यवाही का इस अभियान पर क्या प्रभाव पड़ा?
  • कितने परिवारों के घर और कितने धार्मिक या सामुदायिक ढांचे हटाए गए? क्या इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि हुई है?
  • बेदखल परिवारों के लिए अस्थायी राहत, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घकालीन पुनर्वास की क्या व्यवस्था है?

निष्कर्ष: पारदर्शिता और मानवीय जिम्मेदारी दोनों जरूरी

असम में 1,100 से अधिक परिवारों की बेदखली केवल एक प्रशासनिक अभियान की खबर नहीं है। यह वन भूमि की कानूनी स्थिति, ऐतिहासिक बसावट, न्यायिक प्रक्रिया और विस्थापित लोगों की गरिमा से जुड़े सवालों का संगम है। राज्य को वन संरक्षण और कानून के पालन का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल स्पष्ट दस्तावेजों, न्यायालय के आदेशों के अनुपालन, निष्पक्ष प्रक्रिया और सार्वजनिक जवाबदेही के साथ होना चाहिए। प्रभावित परिवारों के दावों की भी रिकॉर्ड के आधार पर जांच होनी चाहिए, न कि केवल मौखिक बयानों या सामुदायिक पहचान के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी कदम हैं—भूमि संबंधी दस्तावेज और न्यायिक आदेश सार्वजनिक करना, बेदखली के आंकड़ों की जिला-वार पुष्टि, प्रभावित लोगों की तत्काल जरूरतों का आकलन और पुनर्वास के बारे में स्पष्ट जानकारी देना। वन संरक्षण और मानवीय गरिमा को परस्पर विरोधी मानने के बजाय प्रशासन को ऐसा कानूनी और पारदर्शी रास्ता अपनाना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय हितों की रक्षा के साथ प्रभावित नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा को भी गंभीरता से लिया जाए।

संपादकीय नोट: इस रिपोर्ट में बेदखली के आंकड़े और निवासियों के बयान समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं। जमीन के कानूनी दर्जे, कथित पुराने सरकारी आवंटन और न्यायालय के आदेशों की वर्तमान स्थिति को अंतिम रूप से समझने के लिए संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और नवीनतम न्यायिक आदेश महत्वपूर्ण हैं।

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