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नई दिल्ली: मासिक धर्म स्वच्छता को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से जोड़ने वाले अपने फैसले पर अमल में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के रवैये पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि यदि उसका फैसला केवल कागजों तक सीमित रह जाता है, तो लड़कियों के मौलिक अधिकारों को वास्तविक रूप से कैसे लागू किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से लिखित जानकारी जुटाने का निर्देश दिया है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगली सुनवाई तक जवाब नहीं देने वाले राज्यों के संबंधित मुख्य सचिवों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से फैसले के अनुपालन की जानकारी मांगी थी, लेकिन अब तक आवश्यक जवाब नहीं मिले हैं। अदालत ने राज्यों के इस रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब केंद्र आवश्यक जानकारी मांग रहा है, तो राज्य और केंद्रशासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं दे रहे।
अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को दिए गए महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। अदालत के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, सुरक्षित सुविधाओं और आवश्यक उत्पादों तक पहुंच केवल स्वास्थ्य या कल्याण का विषय नहीं है; इसका सीधा संबंध गरिमा, समानता और शिक्षा प्राप्त करने की क्षमता से भी है।
यह मामला स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए केंद्र की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को देशभर में प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग से जुड़ा है। याचिका में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कक्षा छह से बारह तक पढ़ने वाली छात्राओं के लिए सुविधाओं और सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता सुनिश्चित करने का मुद्दा उठाया गया था। अदालत के निर्देशों का दायरा सरकारी ही नहीं, निजी स्कूलों तक भी है।
स्कूलों में किन सुविधाओं को सुनिश्चित करना है?
अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग, चालू और उपयोग योग्य शौचालय हों। इन शौचालयों में पानी की उपलब्धता, निजता और दिव्यांग बच्चों की जरूरतों के अनुरूप पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है। केवल शौचालय का निर्माण कर देना पर्याप्त नहीं है; उनका नियमित रखरखाव और वास्तविक उपयोग संभव होना चाहिए।
फैसले के तहत स्कूलों में छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध कराने, मासिक धर्म से संबंधित आवश्यक सामग्री रखने, इस्तेमाल किए गए उत्पादों के सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल निपटान की व्यवस्था करने तथा मासिक धर्म और यौवन से जुड़े स्वास्थ्य विषयों पर जागरूकता बढ़ाने के निर्देश भी शामिल हैं। शौचालयों में ढक्कन वाले कूड़ेदान, नियमित सफाई और उचित निपटान व्यवस्था इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। शिक्षकों को भी इस विषय पर संवेदनशील बनाने की जरूरत है, ताकि छात्राएं शर्म, भेदभाव या उपहास के डर के बिना मदद मांग सकें।
सिर्फ आंकड़े नहीं, जमीन पर लागू होने का प्रमाण चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी राज्यों से केवल हां या ना में जवाब देने अथवा सामान्य आंकड़े प्रस्तुत करने के बजाय वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। राज्यों को बताना होगा कि किन स्कूलों में सुविधाओं की कमी है, कमी के कारण क्या हैं और उन्हें दूर करने में कितना समय लगेगा। इस तरह अनुपालन की समीक्षा केवल सरकारी रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं की वास्तविकता पर भी केंद्रित होगी।
एक सितंबर के आदेश के बाद केंद्र ने अदालत को बताया था कि देशभर के स्कूलों में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय तथा धुलाई की सुविधाओं से जुड़े 30,458 शौचालय बनाए जा चुके हैं, जबकि 4,236 का निर्माण जारी था। हालांकि, निर्माण के आंकड़े अपने आप यह साबित नहीं करते कि हर स्कूल में शौचालय चालू है, पानी उपलब्ध है, नियमित सफाई होती है और छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन मिल रहे हैं। अदालत अब राज्यों से इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट जानकारी चाहती है।
मासिक धर्म के कारण पढ़ाई छूटना गंभीर चिंता
पीठ ने कहा कि उसका फैसला विशेष रूप से उन लड़कियों के हित में है, जो मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं और स्वच्छता की समस्याओं के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। दूरदराज और संसाधन-विहीन क्षेत्रों में समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, जहां स्कूलों में पानी, सुरक्षित शौचालय, निजी स्थान या आवश्यक उत्पाद उपलब्ध नहीं होते। ऐसी परिस्थितियों में छात्राओं की नियमित उपस्थिति प्रभावित होती है और शिक्षा में लैंगिक अंतर बढ़ सकता है।
मासिक धर्म एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, लेकिन सामाजिक झिझक, गलत धारणाओं और सुविधाओं की कमी के कारण यह कई छात्राओं के लिए शिक्षा में बाधा बन जाती है। स्कूलों में स्वच्छ और सुरक्षित व्यवस्था, सही जानकारी और शिक्षकों का सहयोग छात्राओं को पढ़ाई जारी रखने में मदद कर सकता है। इसीलिए अदालत का निर्देश केवल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं, बल्कि स्कूलों के बुनियादी ढांचे और सामाजिक दृष्टिकोण में सुधार से भी जुड़ा है।
14 दिसंबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश से लिखित रूप में पूछे कि फैसले को लागू करने के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं। केंद्र को फैसले का दोबारा अध्ययन कर उसके प्रत्येक पहलू पर जानकारी जुटाने को कहा गया है। अदालत ने राज्यों को अंतिम अवसर देते हुए मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 के लिए निर्धारित की है।
पीठ ने चेतावनी दी है कि यदि अगली सुनवाई पर केंद्र यह बताता है कि कुछ राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों ने जवाब नहीं दिया, तो संबंधित मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी किया जा सकता है। यह चेतावनी अनुपालन की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, अवमानना नोटिस जारी करने की चेतावनी और वास्तव में नोटिस जारी होना अलग-अलग बातें हैं; आगे की कार्रवाई अदालत के समक्ष पेश होने वाली जानकारी पर निर्भर करेगी।
फैसले की असली कसौटी क्या होगी?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक अधिकार को रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे बदला जाए। हर स्कूल में कार्यशील शौचालय, पानी, निजता, मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और सुरक्षित कचरा निपटान सुनिश्चित करना प्रशासनिक जिम्मेदारी है। इसके साथ नियमित निरीक्षण, बजट, जवाबदेही और शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था भी जरूरी होगी। राज्यों को केवल आदेशों के अनुपालन का दावा नहीं करना चाहिए, बल्कि यह दिखाना होगा कि सुविधाएं वास्तव में छात्राओं तक पहुंच रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य को अब केवल निजी या सामाजिक विषय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब इसे अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार के रूप में मान्यता मिल चुकी है, तो उसके प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सरकारों पर है। अब निगाहें राज्यों की रिपोर्ट, केंद्र की अनुपालन संबंधी जानकारी और 14 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेंगी।
यह समाचार उपलब्ध न्यायिक और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। मामले में आगे आने वाले आदेशों के अनुसार विवरण में बदलाव संभव है।
