असम में भाजपा ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अपना जनजागरण अभियान शुरू कर दिया है। पार्टी की ओर से घोषित कार्यक्रम के तहत 13 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक राज्य के जिला मुख्यालयों पर रैलियां और जुलूस आयोजित किए जाने हैं। भाजपा नेतृत्व का कहना है कि इस अभियान के जरिए वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर जनता के सामने अपना पक्ष रखना चाहती है। वहीं, कांग्रेस और विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया तथा निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
नलबाड़ी की रैली से अभियान की शुरुआत
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, असम के नलबाड़ी में मंगलवार को जन जागरण अभियान के तहत एक बड़ी सभा आयोजित हुई। कार्यक्रम में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया, असम सरकार के मंत्री और नलबाड़ी के विधायक जयंत मल्ल बरुआ, संगठन से जुड़े नेता तथा अन्य जनप्रतिनिधि शामिल हुए। आयोजकों ने सभा में 30 हजार से अधिक लोगों की मौजूदगी का दावा किया, हालांकि इस संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए भीड़ से जुड़े इस आंकड़े को आयोजकों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सभा में रोजगार, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, असम की सांस्कृतिक पहचान और मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे मुद्दे उठाए गए। बड़ी संख्या में युवाओं और महिलाओं की मौजूदगी को भी आयोजकों ने रेखांकित किया। हालांकि किसी एक रैली में शामिल लोगों की राय के आधार पर पूरे राज्य या सभी युवाओं की राजनीतिक सोच के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
भाजपा का आरोप: संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अभियान की घोषणा करते हुए कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने और लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। भाजपा का कहना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस निर्वाचन आयोग तथा अन्य संस्थाओं के बारे में जो सवाल उठा रहे हैं, उनसे संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ये भाजपा के राजनीतिक आरोप हैं; इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के पक्ष के रूप में समझना चाहिए।
कांग्रेस और विपक्षी दलों का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों और उसके पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने आपत्तियां दर्ज की हैं। इस विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि मतदाता सूची को सही करने की प्रक्रिया किस तरह संचालित हो, नागरिकों को अपने नाम की जांच और सुधार का अवसर कैसे मिले तथा शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा कैसे हो।
हर पांच साल में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की मांग
नलबाड़ी की सभा में मंत्री जयंत मल्ल बरुआ ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को हर पांच साल में कराने की वकालत की। उन्होंने असम में अवैध प्रवासन और उससे जुड़े ऐतिहासिक आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदाता सूची में किसी विदेशी नागरिक का नाम नहीं होना चाहिए। भाजपा इस प्रक्रिया को मतदाता सूची की जांच और सुधार के उपाय के रूप में पेश कर रही है।
हालांकि, किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पात्र भारतीय नागरिकों के नाम गलती से न हटें और जिन लोगों के दस्तावेजों या विवरण में समस्या हो, उन्हें उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिले। मतदाता सूची की शुद्धता और हर पात्र नागरिक के मतदान अधिकार की रक्षा—दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
ईवीएम और मतपत्र को लेकर भी राजनीतिक टकराव
सभा में बरुआ ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम को लेकर कांग्रेस और विपक्ष की आपत्तियों की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव में हार के बाद विपक्ष कभी ईवीएम तो कभी अन्य चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है। उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की उस चुनौती का भी उल्लेख किया, जिसमें मतपत्र से चुनाव कराने के प्रस्ताव पर राजनीतिक दलों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने की बात कही गई थी।
ईवीएम की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता पर बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। ऐसे सवालों का जवाब निर्वाचन नियमों, उपलब्ध प्रमाणों, जांच की प्रक्रियाओं और संबंधित संस्थाओं के आधिकारिक स्पष्टीकरण के आधार पर दिया जाना चाहिए। किसी पक्ष का आरोप अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं होता; उसी तरह किसी आरोप को केवल राजनीतिक बयान बताकर खारिज करने के बजाय तथ्यात्मक जांच और पारदर्शी जवाबदेही जरूरी है।
युवाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दावे
रैली में कुछ युवा प्रतिभागियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व के प्रति समर्थन जताया। उन्होंने रोजगार, सरकारी भर्ती, चिकित्सा शिक्षा, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं तथा उद्योगों को आकर्षित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। कुछ वक्ताओं ने असम की भाषा, संस्कृति और विरासत के संरक्षण को भी अहम मुद्दा बताया। दूसरी ओर, देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा मतदाताओं की प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा, महंगाई, सामाजिक अवसरों और शासन जैसे अनेक विषयों से प्रभावित हो सकती हैं।
इसलिए नलबाड़ी की सभा में व्यक्त विचारों को वहां मौजूद प्रतिभागियों की राय के रूप में दर्ज करना अधिक सटीक है। इसे पूरी युवा पीढ़ी या असम के सभी मतदाताओं की साझा राय नहीं माना जा सकता। किसी राजनीतिक दल को युवाओं का कितना समर्थन प्राप्त है, इसका आकलन व्यापक और विश्वसनीय आंकड़ों से ही किया जा सकता है।
आगे क्या होगा?
भाजपा का घोषित कार्यक्रम 31 अक्टूबर तक असम के विभिन्न जिला मुख्यालयों में जारी रहने वाला है। इससे राज्य में भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तथा जनसभाओं का दौर तेज होने की संभावना है। अभियान का वास्तविक प्रभाव केवल रैलियों में जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि इस बात से भी समझा जाएगा कि मतदाता सूची, रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर जनता को कितनी ठोस जानकारी मिलती है।
इस पूरे विवाद में नागरिकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे राजनीतिक दावों को तथ्य से अलग रखें, अपने मतदाता विवरण की आधिकारिक माध्यमों से जांच करें और किसी भी कथित अनियमितता के संबंध में प्रमाण तथा निर्धारित शिकायत प्रक्रिया पर भरोसा करें। लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध और सवाल उठाने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर बहस का आधार प्रमाण, पारदर्शिता और सभी पात्र मतदाताओं के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
