October 21, 2026
close up shot of dogs

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close up of puppies
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आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ और प्रयागराज में नगर निगम प्रशासन की जवाबदेही तय करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। अदालत ने दोनों शहरों के नगर आयुक्तों को निर्देश दिया है कि पिछले तीन वर्षों में दर्ज डॉग-बाइट मामलों, नगर निगम में मिली शिकायतों और पशु चिकित्सा रिकॉर्ड के आधार पर ऐसे इलाकों की पहचान की जाए जहां बार-बार कुत्तों के हमले हुए हैं। अदालत ने इन क्षेत्रों में आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले या बार-बार हमला करने के लिए पहचाने गए कुत्तों को मानवीय तरीके से पकड़ने और निर्धारित पशु चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था करने को कहा है।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने ये निर्देश 1 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के आवारा कुत्तों और डॉग-बाइट घटनाओं से जुड़े आदेशों के अनुपालन की स्वतः संज्ञान कार्यवाही में दिए। LiveLaw की 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।

तीन साल के रिकॉर्ड से बनेंगे डॉग-बाइट हॉटस्पॉट

अदालत ने कहा कि केवल शपथपत्रों में प्रशासनिक कदमों, समितियों या ऑनलाइन पोर्टल का उल्लेख पर्याप्त नहीं है; यह देखना जरूरी है कि जमीन पर वास्तव में क्या कार्रवाई हुई। दोनों नगर आयुक्तों को वर्षवार और क्षेत्रवार विवरण तैयार करना होगा, जिसमें दर्ज मामलों के आधार पर हमले की जगह, बार-बार घटना होने वाले इलाके और बढ़ते मामलों की जानकारी शामिल हो। इसके लिए स्वास्थ्य संस्थानों के रिकॉर्ड, नगर निगम की शिकायतें और पशु चिकित्सा विभाग का डेटा देखा जाएगा।

अदालत ने दोनों शहरों में ऐसे कम से कम 30 अतिरिक्त सार्वजनिक स्थानों का निरीक्षण करने का भी निर्देश दिया है, जिन्हें केवल पुराने डॉग-बाइट रिकॉर्ड के आधार पर नहीं चुना गया हो। इनमें बड़े अस्पताल, स्कूल, रेलवे स्टेशन, बाजार, पार्क और अधिक आवाजाही वाले अन्य स्थान शामिल हो सकते हैं। इनके परिसर, आसपास की सड़कों और प्रवेश मार्गों का भी निरीक्षण किया जाएगा। पूरी कवायद एक महीने के भीतर पूरी करने को कहा गया है।

आक्रामक कुत्तों की पहचान और पशु चिकित्सा प्रबंधन

चिह्नित स्थानों पर नगर निगम और पशु चिकित्सा अधिकारियों की टीमें कुत्तों की अनुमानित संख्या दर्ज करेंगी और संख्या का आकलन किस तारीख तथा किस तरीके से किया गया, यह भी बताएंगी। अधिकारी पिछले तीन वर्षों में कुत्तों को पकड़ने, नसबंदी कराने और टीकाकरण से संबंधित कार्रवाई का विवरण भी देंगे। बार-बार हमले या आक्रामक व्यवहार से जुड़े मामलों की अलग पहचान की जाएगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पकड़े गए कुत्तों को पहचाने गए पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्र या उपयुक्त पशु चिकित्सा सुविधा में ले जाया जाए, जहां उनकी जांच, उपचार, नसबंदी और टीकाकरण चिकित्सकीय जरूरत के अनुसार किया जा सके। आक्रामक व्यवहार दिखाने वाले या रेबीज से संक्रमित होने की आशंका वाले कुत्तों का अलग से आकलन किया जाए और जरूरत के अनुसार पृथक्करण या क्वारंटीन की व्यवस्था हो।

प्रशासन को यह भी दर्ज करना होगा कि कुत्ते की पहचान किस स्थान पर और किस आधार पर की गई, उसे किस केंद्र में पहुंचाया गया और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई। अदालत के आदेश के बाद पकड़े गए कुत्तों का विवरण तथा बार-बार हमले से जुड़े कुत्तों की मौजूदा स्थिति भी रिपोर्ट में अलग से बतानी होगी। निर्देशों में पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार और लागू कानूनी प्रक्रियाओं का पालन अहम है; इसे सभी आवारा कुत्तों को बिना भेदभाव हटाने का आदेश नहीं समझा जाना चाहिए।

‘लखनऊ मॉडल’ पर भी मांगा जवाब

लखनऊ नगर आयुक्त को विशेष रूप से यह बताने को कहा गया है कि कथित ‘लखनऊ मॉडल’ किस तरह काम करता है, जरहरा स्थित प्रशिक्षण सुविधा की मौजूदा भूमिका क्या है और इस मॉडल की सफलता के समर्थन में कौन-से सत्यापित परिणाम उपलब्ध हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि इस मॉडल की कौन-सी प्रक्रियाएं अन्य शहरों में उपयोगी हो सकती हैं।

इसके साथ नगर निगम और पशु चिकित्सा व्यवस्था की कमियों का ब्यौरा भी मांगा गया है। अधिकारियों को टीमों, कर्मचारियों, विशेषज्ञता, उपकरणों और उपयुक्त कार्यप्रणाली की कमी बतानी होगी। ABC केंद्रों की क्षमता, प्रशिक्षित कर्मचारियों, आगे के उपचार और कुत्तों के कानूनी रूप से उचित प्रबंधन से जुड़ी बाधाओं का भी उल्लेख करना होगा।

अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों की सुरक्षा

अदालत ने कहा है कि कार्ययोजना में हर चिन्हित क्षेत्र में बचे हुए कुत्तों की अनुमानित संख्या, हटाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे आक्रामक कुत्तों और भविष्य में घटनाओं को रोकने के उपायों का विवरण होना चाहिए। अस्पतालों, स्कूलों और अन्य संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित संस्थानों के प्रमुखों, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों, नगर निगम तथा पशु चिकित्सा अधिकारियों और नामित नोडल अधिकारियों को सहयोग करना होगा। जिलाधिकारियों को समन्वय करने और कार्रवाई में आने वाली बाधाओं को दूर करने की जिम्मेदारी दी गई है।

सभी कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों, पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी लागू मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुरूप होने चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लखनऊ और प्रयागराज पर केंद्रित निगरानी से उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करने की जिम्मेदारी कम नहीं होगी।

सिर्फ आदेश नहीं, जमीन पर परिणाम की परीक्षा

यह मामला शहरी सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु कल्याण—तीनों से जुड़ा है। डॉग-बाइट की घटनाओं को रोकने के लिए विश्वसनीय रिकॉर्ड, समय पर चिकित्सकीय सहायता, रेबीज से बचाव, प्रभावी नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम तथा जिम्मेदार नगर प्रशासन आवश्यक हैं। साथ ही, कार्रवाई वैज्ञानिक आकलन और कानूनी मानकों के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल शिकायतों या किसी स्थान पर कुत्तों की मौजूदगी के आधार पर।

हाईकोर्ट ने दोनों नगर आयुक्तों से अगली सुनवाई से पहले अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने को कहा है। 5 नवंबर को होने वाली सुनवाई में अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि हॉटस्पॉट की पहचान, अतिरिक्त स्थलों का निरीक्षण और पशु चिकित्सा प्रबंधन की योजना किस स्तर तक पहुंची। अब मुख्य कसौटी यह होगी कि प्रशासनिक घोषणाएं वास्तविक, मापने योग्य और कानून के अनुरूप कार्रवाई में बदलती हैं या नहीं।

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