मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया। यह लगभग चार वर्षों में पहली नीतिगत दर वृद्धि है। केंद्रीय बैंक का संकेत स्पष्ट है कि आर्थिक वृद्धि मजबूत रहने के बावजूद महंगाई और बाहरी आर्थिक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन मौद्रिक नीति का एक दूसरा पक्ष भी है—इसका असर ऋण लेने वाले परिवारों और छोटे कारोबारों की जेब पर पड़ सकता है।
आरबीआई ने दर क्यों बढ़ाई?
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार महंगाई, ऊंची जिंस कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और महंगा कच्चा तेल आरबीआई के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं। अगस्त की खुदरा महंगाई लगभग 4.8 प्रतिशत रही। दूसरी ओर आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 की आर्थिक वृद्धि को लगभग 7.1 प्रतिशत के मजबूत स्तर पर देखा है। इसका अर्थ है कि केंद्रीय बैंक का आकलन है कि अर्थव्यवस्था फिलहाल कुछ महंगी वित्तीय परिस्थितियों को सहन करने की स्थिति में है।
रेपो दर बढ़ने से ईएमआई पर क्या असर पड़ता है?
रेपो दर वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक केंद्रीय बैंक से धन लेते हैं। जब इससे जुड़ी उधारी महंगी होती है तो रेपो से जुड़े परिवर्ती ब्याज वाले ऋणों की ब्याज दर भी बदल सकती है। बैंक ग्राहक की ईएमआई बढ़ा सकता है या ऋण की अवधि बढ़ा सकता है। 25 आधार अंकों की वृद्धि छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन लंबे समय के गृह ऋण में ब्याज का कुल बोझ उल्लेखनीय हो सकता है।
क्या हर ऋण लेने वाला प्रभावित होगा?
नहीं। निश्चित ब्याज दर वाले ऋण पर तत्काल असर सामान्यतः नहीं पड़ता। रेपो से जुड़े परिवर्ती दर वाले गृह ऋण सबसे पहले प्रभावित हो सकते हैं। व्यक्तिगत और वाहन ऋण पर प्रभाव बैंक के संदर्भ दर और पुनर्निर्धारण की शर्तों पर निर्भर करेगा। इसलिए ग्राहकों को केवल दर की खबर देखकर घबराने के बजाय अपने ऋण समझौते और ब्याज पुनर्निर्धारण की शर्तें देखनी चाहिए।
छोटे कारोबारों के लिए चुनौती
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण की लागत सीधे कार्यशील पूंजी, माल खरीद, मशीनरी और विस्तार योजनाओं को प्रभावित करती है। बड़ी कंपनियों के पास बांड बाजार और कई वित्तीय विकल्प होते हैं, जबकि छोटे कारोबार बैंक ऋण पर अधिक निर्भर रहते हैं। इसलिए दर वृद्धि का दबाव केवल गृह ऋण लेने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा।
क्या बचतकर्ताओं को फायदा होगा?
ब्याज दर बढ़ने का एक सकारात्मक पहलू जमाकर्ताओं के लिए हो सकता है। यदि बैंक जमा पर ब्याज दरें बढ़ाते हैं तो वरिष्ठ नागरिकों और निश्चित आय पर निर्भर परिवारों को लाभ मिल सकता है। हालांकि यदि ऋण महंगा होने से निवेश और उपभोग तेजी से कमजोर होते हैं तो अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर भी पड़ सकता है।
CINN विश्लेषण: आरबीआई का फैसला महंगाई के खिलाफ एहतियाती कदम के रूप में देखा जा सकता है। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि आने वाले महीनों में महंगाई कितनी नियंत्रित होती है और आर्थिक वृद्धि कितनी स्थिर रहती है। यदि आपूर्ति से जुड़ी महंगाई बनी रहती है, तो केवल ब्याज दर बढ़ाने की कीमत ऋण लेने वालों को चुकानी पड़ सकती है।
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