सरकार के खर्च और आय के बीच बढ़ा अंतर, अप्रैल से अगस्त तक ₹7.1 लाख करोड़ का Fiscal Deficit
नई दिल्ली। भारत सरकार के वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा ₹7.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह पूरे वित्त वर्ष के लिए तय किए गए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का करीब 41.9 प्रतिशत है। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह घाटा लगभग ₹6 लाख करोड़ था।
राजकोषीय घाटा यानी Fiscal Deficit सरकार की कुल आय और उसके कुल खर्च के बीच का अंतर होता है। जब सरकार का खर्च उसकी प्राप्तियों से अधिक हो जाता है तो इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधारी का सहारा लेना पड़ता है। इसलिए राजकोषीय घाटे का आंकड़ा देश की वित्तीय स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अप्रैल से अगस्त की अवधि में 41.9 प्रतिशत का आंकड़ा अपने आप में यह नहीं बताता कि सरकार पूरे साल के लक्ष्य से बाहर निकल गई है। वित्त वर्ष के अलग-अलग महीनों में सरकार की आय और खर्च समान गति से नहीं चलते। टैक्स कलेक्शन, सरकारी योजनाओं पर खर्च, पूंजीगत व्यय और अन्य प्राप्तियों का समय अलग-अलग हो सकता है।
फिर भी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में घाटे में वृद्धि को बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाएगा। सरकार के सामने एक तरफ infrastructure, welfare और development expenditure को बनाए रखने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ राजकोषीय अनुशासन का लक्ष्य भी महत्वपूर्ण है।
राजकोषीय घाटे का सीधा संबंध सरकारी borrowing से भी होता है। यदि सरकार को अपने खर्च और राजस्व के बीच का अंतर पूरा करने के लिए अधिक उधार लेना पड़े तो bond market, interest rates और निजी क्षेत्र की borrowing costs पर भी उसका प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी तरफ सरकारी खर्च का बड़ा हिस्सा infrastructure और capital expenditure में जाता है तो इसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और long-term productive capacity को बढ़ाना भी हो सकता है। इसलिए केवल घाटे की मात्रा देखना पर्याप्त नहीं होता; यह देखना भी जरूरी होता है कि सरकार वह पैसा किन क्षेत्रों में खर्च कर रही है।
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-अगस्त 2026 में ₹7.1 लाख करोड़ का fiscal deficit पूरे साल के लक्ष्य का 41.9 प्रतिशत रहा।
अब आने वाले महीनों में tax collections, disinvestment/other non-tax revenues और सरकारी expenditure की गति यह तय करेगी कि वित्त वर्ष के अंत तक सरकार अपने निर्धारित fiscal deficit target के कितने करीब रहती है।
