नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को 21 अक्टूबर को दिल्ली की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश पर तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया। दोनों ने लिखित आश्वासन दिया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे और जब तक जंतर-मंतर को कानून के तहत प्रदर्शन स्थल के रूप में फिर से अधिसूचित नहीं किया जाता, वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में कोई प्रदर्शन किया गया तो वह संविधान और कानून के दायरे में होगा।
मंदिर मार्ग पुलिस थाने में स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत ने दोनों को जांच पूरी होने तक 50-50 हजार रुपये के निजी और जमानती बंधपत्र देने का निर्देश दिया। अदालत ने जमानतदारों को संतोषजनक पाए जाने के बाद रिहाई वारंट जारी किया। हालांकि, मामले की जांच समाप्त नहीं हुई है। दोनों नेताओं को हर सुनवाई पर अदालत में उपस्थित रहने, शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने तथा अपने बंधपत्रों और लिखित आश्वासनों की शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया गया है।
अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे तय की है। जांच अधिकारी को जमानतदारों के सत्यापन की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। दोनों नेताओं और उनके जमानतदारों को अगली सुनवाई पर उपस्थित रहना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच कानून के अनुसार जारी रहेगी। इसलिए रिहाई को आरोपों से बरी होना या कार्यवाही का अंत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने हिरासत जारी रखना जरूरी क्यों नहीं समझा?
दिल्ली पुलिस ने निवारक कार्यवाही में दोनों की न्यायिक हिरासत तीन दिन और बढ़ाने की मांग की थी। पुलिस का तर्क था कि उनके बयानों और बाद के आचरण को देखते हुए शांति भंग होने की आशंका बनी हुई है। पुलिस ने जेल ले जाते समय समूह के एक अन्य सदस्य द्वारा मीडिया को दिए गए बयान का भी उल्लेख किया, जिसे उसने अदालत के अधिकार को कमतर दिखाने वाला बताया। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने इस आचरण को दोहराया न जाने का आश्वासन दिया और बिना शर्त मौखिक माफी भी पेश की।
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135(3) के तहत शांति बनाए रखने के लिए जरूरी तत्काल कदम, इस स्थिति में, बंधपत्र और अदालत में दिए गए लिखित आश्वासन के माध्यम से सुनिश्चित किए जा सकते हैं। अदालत के अनुसार, इन आश्वासनों के बाद फिलहाल न्यायिक हिरासत जारी रखना आवश्यक नहीं दिखा। यह आदेश निवारक कार्यवाही के संदर्भ में है; इससे किसी व्यापक आपराधिक आरोप पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा विवाद
CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध-प्रदर्शन से जुड़े थे। पार्टी ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए हैं। ये राजनीतिक आरोप हैं; निर्वाचन आयोग ने पहले कहा है कि हटाए गए मतदाताओं में मृत, स्थानांतरित या सत्यापित न हो सके लोग शामिल हैं और जिनके नाम गलत तरीके से हटे हों, वे दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं। किसी भी दावे का आकलन संबंधित रिकॉर्ड और आधिकारिक जवाबों के आधार पर किया जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, दोनों नेताओं को पहले भी शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र देने पड़े थे। पुलिस का आरोप है कि 13 अक्टूबर को वे बैरिकेड और बंद प्रवेश मार्ग पार कर जंतर-मंतर पहुंचे, जहां प्रदर्शन स्थल के दर्जे को लेकर प्रतिबंध लागू थे। इसके बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 14 अक्टूबर को दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था। 19 अक्टूबर को हिरासत दो दिन और बढ़ाई गई। पुलिस ने आगे हिरासत की मांग की, लेकिन 21 अक्टूबर को अदालत ने लिखित आश्वासनों और बंधपत्रों को पर्याप्त मानते हुए रिहाई का आदेश दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका वापस
हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसे 21 अक्टूबर को वापस ले लिया गया। इससे पहले सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कथित बंधपत्र उल्लंघन और बैरिकेड पार कर प्रदर्शन करने के परिणामों पर सवाल उठाए थे। सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं समझना चाहिए।
प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था
जंतर-मंतर लंबे समय से दिल्ली में राजनीतिक और सामाजिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल रहा है। लेकिन प्रदर्शन के लिए स्थान, अनुमति, सुरक्षा और यातायात से जुड़े नियम लागू हो सकते हैं। प्रशासन का कहना है कि जंतर-मंतर फिलहाल कानून के तहत अधिकृत प्रदर्शन स्थल नहीं है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार सभा करने के अधिकार से जुड़ा है। ये अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन निरपेक्ष नहीं; संविधान सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ आधारों पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। इसलिए किसी प्रदर्शन पर रोक या प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कार्रवाई का आकलन करते समय यह देखना जरूरी है कि प्रतिबंध कानून के अनुसार था या नहीं और कार्रवाई उचित प्रक्रिया के अनुरूप थी या नहीं।
इस मामले में प्रशासन सार्वजनिक शांति और स्थल के नियमन की जिम्मेदारी का हवाला दे रहा है, जबकि CJP मतदाता सूची और निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रही है। दोनों पक्षों के दावों का मूल्यांकन आदेशों, लागू नियमों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
23 अक्टूबर की सुनवाई में जमानतदारों के सत्यापन और निवारक कार्यवाही के अगले कदम सामने आ सकते हैं। फिलहाल दोनों नेता सशर्त रिहा हैं, लेकिन उन्हें हर सुनवाई पर उपस्थित रहना होगा और शांति बनाए रखने संबंधी शर्तों का पालन करना होगा। जंतर-मंतर की अधिसूचना की स्थिति भी आगे के घटनाक्रम में अहम होगी।
यह प्रकरण राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के नियमन, निवारक हिरासत और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठाता है। अंतिम स्थिति आगे की न्यायिक कार्यवाही और उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट होगी।
कानूनी सावधानी: इस रिपोर्ट में पुलिस के आरोप, नेताओं के आश्वासन और अदालत के आदेश को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है। रिहाई को सभी आरोपों से बरी होना नहीं माना जाना चाहिए; जांच जारी है।
