October 21, 2026
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नई दिल्ली: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को आधिकारिक कामकाज के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी प्रतिरक्षा पर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2026 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। याचिका में वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने अभी इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है; फिलहाल मामला विचाराधीन है।

विवाद की जड़ क्या है?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून, 2023 की धारा 16 कहती है कि किसी वर्तमान या पूर्व CEC अथवा EC के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन या निर्वहन का प्रयास करते समय किए गए किसी कार्य, बात या कथन के संबंध में कोई अदालत दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती और न ही उसे जारी रख सकती है।

इस प्रावधान के समर्थकों के अनुसार, चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था के अधिकारियों को राजनीतिक दबाव और बदले की भावना से दायर मुकदमों से बचाना जरूरी है। दूसरी ओर, आलोचकों का सवाल है कि यदि संरक्षण बहुत व्यापक और बिना स्पष्ट अपवादों के हो, तो कथित गलत आचरण के लिए जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?

धारा 16 पर ADR की आपत्ति

ADR का तर्क है कि यह प्रावधान वर्तमान पदाधिकारियों के साथ-साथ पूर्व निर्वाचन आयुक्तों पर भी लागू होता है और आधिकारिक कामकाज से जुड़े मामलों में दीवानी तथा आपराधिक—दोनों प्रकार की कार्यवाही को रोकता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, धारा में सद्भावना से किए गए कार्यों की स्पष्ट शर्त, किसी सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के जरिए कार्रवाई का रास्ता या ऐसी कार्यवाही को सुरक्षित रखने वाला अपवाद मौजूद नहीं है। ADR ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 तथा संविधान की मूल संरचना से जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में चुनौती दी है। ये याचिकाकर्ता के तर्क हैं, अदालत के निष्कर्ष नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है और इस याचिका को इसी तरह की एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ा है। नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों या तर्कों को स्वीकार कर लिया है। अंतिम निर्णय सुनवाई और पक्षकारों के जवाबों के बाद ही होगा।

सरकार और निर्वाचन आयोग के पक्ष में क्या तर्क हो सकते हैं?

निर्वाचन आयोग ऐसे फैसले लेता है जिनका सीधा असर राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और चुनावी प्रक्रिया पर पड़ता है। मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम, आचार संहिता और चुनाव प्रबंधन से जुड़े निर्णयों पर असंतुष्ट पक्ष मुकदमे दायर कर सकते हैं। यदि हर निर्णय के बाद अधिकारियों को व्यक्तिगत मुकदमों का सामना करना पड़े, तो इससे स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका है।

इस दृष्टिकोण से कानूनी सुरक्षा का उद्देश्य किसी अधिकारी को कानून से ऊपर रखना नहीं, बल्कि उसे वैध आधिकारिक कार्य करने के लिए अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचाना बताया जाता है। समर्थक यह भी रेखांकित कर सकते हैं कि धारा 16 का पाठ आधिकारिक कर्तव्य से संबंधित कार्यों पर केंद्रित है, न कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन में किए गए हर काम पर। हालांकि, ‘आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन का प्रयास’ जैसे शब्दों की सीमा और व्याख्या स्वयं कानूनी बहस का विषय बन सकती है।

अनुच्छेद 14: समानता और उचित वर्गीकरण का सवाल

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति के साथ हर परिस्थिति में बिल्कुल एक जैसा व्यवहार होना चाहिए। संसद अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर वर्गीकरण कर सकती है, लेकिन उस वर्गीकरण का उचित आधार होना चाहिए और उसका कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध भी होना चाहिए।

इस मामले में मूल प्रश्न है कि क्या CEC और ECs को आधिकारिक कार्यों के संबंध में इस स्तर की प्रतिरक्षा देना चुनावी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक और उचित है, या यह संरक्षण जवाबदेही को असंतुलित रूप से सीमित करता है। न्यायालय को कानून के पाठ, उसके उद्देश्य, अन्य संवैधानिक व्यवस्थाओं और उपलब्ध जवाबदेही उपायों को ध्यान में रखकर विचार करना होगा।

राष्ट्रपति, राज्यपाल और न्यायाधीशों की प्रतिरक्षा से तुलना

संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों को पद पर रहते हुए कुछ विशेष संरक्षण देता है। यह व्यवस्था निर्वाचन आयुक्तों पर लागू धारा 16 के समान नहीं है: संवैधानिक पदों के लिए संरक्षण का दायरा, अवधि और प्रकृति अलग-अलग प्रावधानों से तय होती है। इसलिए इन व्यवस्थाओं की तुलना करते समय यह देखना जरूरी है कि संरक्षण किस व्यक्ति को, किस अवधि के लिए और किस प्रकार की कार्यवाही से मिलता है।

न्यायाधीशों के संबंध में Judges (Protection) Act, 1985 की धारा 3 भी प्रासंगिक तुलना है। इस कानून में न्यायिक या आधिकारिक कार्यों के लिए सुरक्षा का प्रावधान है, लेकिन धारा 3(2) कुछ सरकारों, अदालतों और अन्य प्राधिकारियों की कार्यवाही करने की शक्ति को सुरक्षित रखती है। आलोचकों का कहना है कि निर्वाचन आयुक्तों से संबंधित धारा 16 में इसी तरह का स्पष्ट अपवाद न होना महत्वपूर्ण अंतर है। यह तुलना बहस को समझने में मदद करती है, लेकिन इससे अपने-आप यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि धारा 16 असंवैधानिक है।

2023 के कानून का व्यापक संदर्भ

वर्ष 2023 का कानून CEC और ECs की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों को नियंत्रित करता है। इसके चयन पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री की भूमिका है। इससे पहले, 2023 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था की थी। नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल और धारा 16 की प्रतिरक्षा संबंधी चुनौती अलग-अलग कानूनी मुद्दे हैं, भले ही दोनों निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और संस्थागत भरोसे से जुड़े हों।

क्या यह प्रतिरक्षा आजीवन है?

धारा 16 में ‘जो व्यक्ति है या रहा है’ जैसी भाषा वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों दोनों को शामिल करती है। इसी वजह से आलोचक इसे पद छोड़ने के बाद भी लागू रहने वाला संरक्षण बताते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि निर्वाचन आयुक्तों को हर प्रकार के मामले में सार्वभौमिक छूट मिल गई है। प्रावधान का संबंध उन कार्यों या कथनों से है जिन्हें आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जोड़ा जाता है। किसी विवाद में यह तय करना कि संबंधित कार्य वास्तव में आधिकारिक दायरे में आता है या नहीं, महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही: बीच का रास्ता क्या हो सकता है?

बहस का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं होना चाहिए कि अधिकारियों को संरक्षण मिले या नहीं। अधिक उपयोगी प्रश्न यह है कि संरक्षण की सीमा क्या हो और उसके दुरुपयोग की स्थिति में कौन-सा रास्ता खुला रहे। एक संभावित मॉडल में सद्भावना से किए गए आधिकारिक कार्यों के लिए सुरक्षा, दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से अधिकार-सीमा से बाहर किए गए कार्यों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया, तथा सक्षम प्राधिकारी या न्यायिक समीक्षा के लिए स्पष्ट अपवाद शामिल हो सकते हैं।

ऐसी व्यवस्था अधिकारियों को निराधार मुकदमों से बचा सकती है, जबकि गंभीर शिकायतों पर जवाबदेही का रास्ता भी बंद नहीं करती। यह एक नीतिगत विकल्प है; मौजूदा धारा की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट का होगा और कानून में बदलाव करना संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

आगे क्या देखना होगा?

अब केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के जवाब, याचिकाकर्ताओं के तर्क तथा सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होंगे। अदालत यह जांच सकती है कि धारा 16 का दायरा संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप है या नहीं, और क्या यह चुनावी संस्था की स्वतंत्रता तथा सार्वजनिक जवाबदेही के बीच उचित संतुलन बनाती है। जब तक अदालत फैसला नहीं सुनाती, इस प्रावधान को वैध या अवैध घोषित करना जल्दबाजी होगी।

निष्कर्ष: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक दबाव और निराधार मुकदमों से बचाना महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक पद पर अधिकार के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। धारा 16 पर चल रही कानूनी बहस इसी संतुलन की परीक्षा है—और इसका परिणाम भारत की चुनावी संस्थाओं में जनता के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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