October 17, 2026
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बैंक ऑफ बड़ौदा ने वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 के दौरान 100 करोड़ रुपये या अधिक बकाया वाले खातों से जुड़े 35,715 करोड़ रुपये के तकनीकी राइट-ऑफ और 9,946 करोड़ रुपये की वसूली बताई। आरटीआई में बड़े कर्जदारों के नाम साझा नहीं किए गए।

नई दिल्ली: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऑफ बड़ौदा ने वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक बकाया वाले कर्जदारों के खातों से जुड़े 35,715 करोड़ रुपये के ऋण को तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डाला। सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब में बैंक ने बताया कि इसी अवधि में इन खातों से कुल 9,946 करोड़ रुपये की वसूली हुई। वहीं, बड़े कर्जदारों के नाम और खातेवार विवरण देने से बैंक ने इनकार कर दिया। यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर के आवेदन के जवाब में सामने आई, जिसकी रिपोर्ट द वायर ने प्रकाशित की।

35,715 करोड़ रुपये का तकनीकी राइट-ऑफ

बैंक के जवाब के अनुसार, 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक बकाया वाले खातों में वित्त वर्ष 2020-21 में 11,916 करोड़ रुपये और 2021-22 में 11,261 करोड़ रुपये के तकनीकी राइट-ऑफ दर्ज किए गए। यह छह वित्त वर्षों में सामने आई कुल राशि का बड़ा हिस्सा है।

यहां तकनीकी राइट-ऑफ का अर्थ समझना जरूरी है। बैंक अपने लेखा-बही खातों से किसी ऋण को हटाता है, लेकिन इससे कर्जदार की देनदारी अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। बैंक के लिए वसूली की कार्रवाई जारी रह सकती है। इसलिए 35,715 करोड़ रुपये को सीधे तौर पर पूरी तरह माफ किया गया कर्ज कहना सही नहीं होगा। वास्तविक वसूली, समझौते और खातेवार स्थिति जानने के लिए अधिक विस्तृत जानकारी जरूरी है।

वसूली 9,946 करोड़ रुपये

बैंक ने संबंधित बड़े खातों से 9,946 करोड़ रुपये की कुल वसूली की जानकारी दी। यह तकनीकी रूप से बट्टे खाते में डाली गई 35,715 करोड़ रुपये की राशि का लगभग 27.8 प्रतिशत है। यह अनुपात उन बड़े कर्ज खातों में वसूली की स्थिति पर सवाल खड़े करता है, लेकिन इससे अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर मामले में वसूली की कार्रवाई विफल रही या हर कर्जदार जानबूझकर भुगतान नहीं कर रहा था। इसके लिए खातेवार विवरण, वसूली के तरीके और कानूनी स्थिति देखना आवश्यक है।

समझौते में 7,817 करोड़ रुपये की कटौती

आरटीआई जवाब में बैंक ने 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के बकाया वाले खातों के निपटारे में 7,817 करोड़ रुपये के ‘हेयरकट’ या समझौते के दौरान दर्ज कटौती की भी जानकारी दी। हेयरकट का सामान्य अर्थ है कि कर्ज के निपटारे में बैंक पूरी बकाया राशि के बजाय कम राशि स्वीकार करता है और शेष रकम को निर्धारित लेखांकन प्रक्रिया के तहत दर्ज करता है। ऐसे निपटारे दिवाला प्रक्रिया या अन्य कानूनी रास्तों के तहत हो सकते हैं।

बैंक ने हालांकि यह नहीं बताया कि किन कर्जदारों के खातों में कितनी कटौती हुई, कौन-से मामले राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) या अन्य मंचों पर निपटाए गए और प्रत्येक मामले में वसूली का आधार क्या था। इसलिए कुल आंकड़े से किसी खास कंपनी या व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

आरटीआई के तहत नाम बताने से क्यों किया इनकार?

विवेक वेलणकर ने बड़े कर्जदारों के नाम और खातेवार जानकारी मांगी थी। रिपोर्ट के अनुसार, बैंक ऑफ बड़ौदा ने तकनीकी राइट-ऑफ से जुड़े नामों को निजी और तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी बताते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) का हवाला दिया। समझौते के जरिए निपटाए गए खातों के नाम और विवरण देने से भी बैंक ने इनकार किया तथा धारा 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) का उल्लेख किया।

इस तरह बैंक ने कुल राशि और कुछ अवधि-वार आंकड़े तो दिए, लेकिन जनता को यह पता नहीं चल पाया कि इन बड़े ऋणों के पीछे कौन-से उधारकर्ता थे। आरटीआई के तहत किसी सूचना को रोकने की वैधता संबंधित अपवादों और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि बैंक का जवाब निश्चित रूप से गैरकानूनी था; इस मुद्दे पर अपील या संबंधित सूचना आयोग की समीक्षा से आगे स्पष्टता आ सकती है।

आंकड़े पूरे पुराने समय को क्यों नहीं समेटते?

रिपोर्ट के अनुसार, आरटीआई आवेदन में अधिक लंबी अवधि की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन बैंक ने तकनीकी राइट-ऑफ, वसूली और हेयरकट के उपलब्ध आंकड़े वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 तक के लिए दिए। बैंक ने कहा कि मांगी गई जानकारी को उसी रूप में तैयार करने के लिए बड़े स्तर पर आंकड़े संकलित करने पड़ेंगे और इससे संसाधनों का अनुपातहीन उपयोग होगा।

यह जवाब एक व्यावहारिक प्रश्न भी खड़ा करता है: क्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बड़े ऋणों, उनकी वसूली और समझौतों के बारे में ऐसी व्यवस्थित जानकारी रख सकते हैं, जिसे सार्वजनिक जवाबदेही के लिए उपयोग किया जा सके? आंकड़ों की उपलब्धता और प्रकटीकरण की सीमा पर स्पष्ट नीति से नागरिकों को सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को समझने में मदद मिल सकती है।

बड़े और छोटे कर्जदारों के साथ व्यवहार पर बहस

आरटीआई कार्यकर्ता वेलणकर ने सवाल उठाया कि बड़े कर्जदारों की पहचान गोपनीय रखी जाती है, जबकि छोटे कर्जदारों के खिलाफ वसूली की कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने आ सकती है। उन्होंने बड़े ऋणों की मंजूरी और बाद में वसूली के प्रयासों में जवाबदेही तय करने की जरूरत पर भी सवाल किया। ये उनकी टिप्पणियां हैं; बैंक के उपलब्ध जवाब से यह अपने आप सिद्ध नहीं होता कि किसी विशेष अधिकारी ने लापरवाही की या किसी कर्जदार को अनुचित लाभ दिया गया।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा धन, ऋण जोखिम और वसूली की प्रक्रिया का महत्व व्यापक है। इसलिए बड़े ऋणों की मंजूरी, निगरानी, चूक के बाद की कार्रवाई और समझौते के आधार का संस्थागत परीक्षण जरूरी है। साथ ही, प्रत्येक ऋण के पीछे कारोबारी जोखिम, सुरक्षा, कानूनी प्रक्रिया और वसूली की वास्तविक संभावनाएं अलग हो सकती हैं।

आगे किन सवालों के जवाब जरूरी हैं?

  • क्या बैंक खातेवार जानकारी रोकने के फैसले और आरटीआई अपवादों का विस्तृत कारण सार्वजनिक कर सकता है?
  • क्या 7,817 करोड़ रुपये के हेयरकट का ऋण-समझौता आधार और प्रक्रिया सार्वजनिक निगरानी के लिए उपलब्ध कराई जा सकती है?
  • बड़े ऋणों में चूक होने पर ऋण स्वीकृति, जोखिम मूल्यांकन और वसूली के निर्णयों की जवाबदेही कैसे तय होती है?
  • क्या सूचना आयोग या अपीलीय प्रक्रिया के जरिए नामों और अन्य विवरणों के प्रकटीकरण पर पुनर्विचार होगा?

निष्कर्ष

बैंक ऑफ बड़ौदा के आरटीआई जवाब से बड़े कर्जदारों के खातों में 35,715 करोड़ रुपये के तकनीकी राइट-ऑफ, 9,946 करोड़ रुपये की वसूली और 7,817 करोड़ रुपये के हेयरकट का कुल परिमाण सामने आया है। लेकिन कर्जदारों के नाम और खातेवार विवरण उपलब्ध न होने से यह समझना कठिन है कि किन मामलों में कितनी वसूली हुई, किन शर्तों पर समझौते हुए और निर्णयों की जवाबदेही किस स्तर पर तय हुई। पारदर्शिता और गोपनीयता के कानूनी पहलुओं के बीच संतुलन बनाते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बड़े ऋणों से जुड़े निर्णयों पर स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।

संपादकीय टिप्पणी: तकनीकी राइट-ऑफ को अपने आप कर्ज माफी न समझें। इस लेख में दिए गए आंकड़े रिपोर्ट में उद्धृत बैंक के आरटीआई जवाब पर आधारित हैं। किसी विशिष्ट कर्जदार या अधिकारी के दोषी होने का दावा नहीं किया गया है।

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