October 20, 2026
छात्रों की मानसिक सेहत और पढ़ाई के तनाव पर जागरूकता

पढ़ाई, परीक्षा, करियर और परिवार की उम्मीदों के बीच बढ़ता मानसिक दबाव अब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के लिए भी बड़ी चिंता है।

बच्चों और युवाओं के जीवन में पढ़ाई का दबाव नया नहीं है, लेकिन आज यह दबाव कई दूसरी चुनौतियों के साथ मिलकर अधिक जटिल हो गया है। परीक्षा, अच्छे नंबर, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, करियर को लेकर अनिश्चितता, परिवार की अपेक्षाएं, दोस्तों से तुलना, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन पर रहने की आदत—इन सबका असर छात्र की मानसिक सेहत पर पड़ सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य अब शिक्षा का भी मुद्दा

छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर देश में भी गंभीर चिंता सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने छात्र मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या से जुड़े मामलों की गंभीरता को देखते हुए 24 मार्च 2025 को राष्ट्रीय टास्क फोर्स के गठन की दिशा में कदम बढ़ाया। इस पहल का उद्देश्य छात्रों के लिए आत्महत्या की रोकथाम, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और बेहतर संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करना है।

इसका मतलब यह नहीं कि परीक्षा का तनाव या कभी-कभार उदासी अपने आप में मानसिक बीमारी है। समस्या तब गंभीर होती है जब तनाव लगातार बना रहे और उसकी वजह से बच्चे की नींद, भूख, पढ़ाई, व्यवहार, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर स्पष्ट असर पड़ने लगे।

इन संकेतों को नजरअंदाज न करें

  • बिना स्पष्ट कारण लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन या गुस्सा
  • पढ़ाई या उन गतिविधियों में रुचि कम होना जिन्हें बच्चा पहले पसंद करता था
  • नींद या भूख में अचानक बदलाव
  • लगातार सिरदर्द, थकान या बेचैनी की शिकायत
  • दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना
  • परीक्षा या परिणाम को लेकर अत्यधिक डर
  • बार-बार रोना, खुद को दूसरों से कम समझना या असफलता का तीखा डर
  • “मुझसे नहीं होगा”, “मैं किसी काम का नहीं हूं” या “सब खत्म हो गया” जैसी बातें कहना

हर बार सवाल नंबरों का क्यों?

कई घरों में बच्चे से पहला सवाल होता है—“कितने नंबर आए?” लेकिन शायद उससे पहले एक और सवाल पूछा जाना चाहिए—“तुम कैसा महसूस कर रहे हो?”

अच्छे नंबर महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे बच्चे की पूरी पहचान नहीं हैं। लगातार तुलना—भाई-बहन, पड़ोसी, रिश्तेदार या क्लासमेट से—बच्चे को प्रेरित करने के बजाय उसके भीतर असफलता और कमतर होने की भावना पैदा कर सकती है।

माता-पिता का काम हर समस्या का तुरंत समाधान देना नहीं, बल्कि बच्चे को यह भरोसा देना भी है कि वह अपनी परेशानी बिना डर के बता सकता है।

सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइम का भी असर

ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल दुनिया ने शिक्षा को आसान बनाया है, लेकिन अत्यधिक स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया पर लगातार तुलना और ऑनलाइन दुनिया में सामाजिक अलगाव भी तनाव बढ़ा सकते हैं। 2026 में प्रकाशित भारतीय छात्रों पर किए गए शोधों में अत्यधिक ऑनलाइन लर्निंग और लंबे स्क्रीन टाइम के साथ anxiety, stress, burnout और social isolation जैसी समस्याओं के संबंध पर भी ध्यान दिया गया है।

इसलिए समाधान केवल “फोन बंद कर दो” कहना नहीं है। बच्चे के लिए पढ़ाई, स्क्रीन, नींद, खेल, परिवार और दोस्तों के बीच संतुलित दिनचर्या बनाना ज्यादा उपयोगी है।

माता-पिता क्या कर सकते हैं?

  • बच्चे की बात बीच में काटे बिना सुनें।
  • उसकी तुलना दूसरे बच्चों से न करें।
  • गलती या कम नंबर को बच्चे के चरित्र से न जोड़ें।
  • पर्याप्त नींद, भोजन, खेल और आराम को पढ़ाई जितना ही जरूरी समझें।
  • बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे तो शिक्षक, काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
  • घर का माहौल ऐसा रखें जहां बच्चा अपनी परेशानी बताने में शर्म या डर महसूस न करे।

स्कूल और कॉलेज की भी जिम्मेदारी

मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी केवल परिवार की नहीं हो सकती। स्कूल और कॉलेजों में आसानी से उपलब्ध counselling support, प्रशिक्षित counsellors, anti-bullying व्यवस्था, peer-support systems और सुरक्षित शिकायत तंत्र होना जरूरी है। छात्र को यह पता होना चाहिए कि परेशानी होने पर वह किस व्यक्ति से संपर्क कर सकता है।

अगर बच्चा आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे

ऐसी बात को “ध्यान खींचने की कोशिश” या “ड्रामा” कहकर टालना खतरनाक हो सकता है। बच्चे को अकेला न छोड़ें, शांत रहकर उसकी बात सुनें और तुरंत परिवार के भरोसेमंद व्यक्ति तथा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ/आपातकालीन सहायता से संपर्क करें। भारत में Tele-MANAS की 24×7 हेल्पलाइन 14416 या 1800-89-14416 पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।

बच्चे से सिर्फ यह मत पूछिए कि उसने कितना पढ़ा

शिक्षा का लक्ष्य केवल अंक, रैंक और नौकरी नहीं होना चाहिए। एक स्वस्थ विद्यार्थी वह है जो सीख सके, सवाल पूछ सके, असफल हो सके, फिर कोशिश कर सके और जरूरत पड़ने पर मदद मांग सके।

बच्चों से सिर्फ यह मत पूछिए कि उन्होंने कितना पढ़ा। कभी यह भी पूछिए—उन्होंने आज कैसा महसूस किया।

यह लेख मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। लगातार या गंभीर लक्षणों की स्थिति में योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना उचित है।

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