अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन में पारदर्शिता को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उज्जैन से अयोध्या तक पदयात्रा शुरू की है। ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ नाम से शुरू यह यात्रा लगभग 930 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और इसके करीब 70 दिन में अयोध्या पहुंचने की संभावना है। यात्रा की शुरुआत 20 अक्टूबर को विजयादशमी के अवसर पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद हुई।
सिंह ने यात्रा के उद्देश्यों में मंदिरों में चढ़ावे के प्रबंधन की पारदर्शिता, राम मंदिर में कथित दान-चोरी के मामले की निष्पक्ष जांच और मतदाता सूचियों से जुड़े कथित अनियमितताओं पर जन-जागरूकता को शामिल किया है। उन्होंने यात्रा को धार्मिक आस्था और जवाबदेही से जुड़ा अभियान बताया है। आयोजकों के अनुसार, यात्रा में राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की प्रतिमाओं वाला एक विशेष रथ भी साथ चल रहा है।
दान की कथित चोरी पर क्या है विवाद?
अयोध्या के राम मंदिर में दान की नकदी और अन्य चढ़ावे की कथित हेराफेरी का मामला इस वर्ष सामने आया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने जून में इस मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया था। जांच के बाद विशेष जांच दल (एसआईटी) ने सितंबर में आरोपपत्र दाखिल किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आरोपपत्र में दान की नकदी हटाए जाने की सीसीटीवी में दर्ज 105 घटनाओं का उल्लेख है और सात आरोपियों से करीब 79.85 लाख रुपये बरामद होने की बात कही गई है।
जांच एजेंसियों के आरोपों के मुताबिक, कथित गड़बड़ी दान की नकदी गिनने की प्रक्रिया के दौरान हुई। हालांकि, आरोपपत्र दाखिल होना अपने आप में किसी आरोपी को दोषी सिद्ध नहीं करता; मामले का अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
इस मामले में एक और सवाल मंदिर ट्रस्ट की निगरानी व्यवस्था को लेकर उठा है। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपपत्र के सार में ट्रस्ट के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका और कथित गड़बड़ी की जानकारी मिलने के बाद की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। दूसरी ओर, जांच में आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है और कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों को अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में दर्ज किए जाने की खबरें आई हैं। इन पहलुओं पर अदालत में उपलब्ध रिकॉर्ड और आगे की सुनवाई अहम होगी।
दिग्विजय सिंह की मांगें क्या हैं?
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दिग्विजय सिंह ने पहले कहा था कि राम मंदिर निर्माण के लिए उन्होंने अलग-अलग अवसरों पर दान दिया था और कथित अनियमितताओं के कारण वह अपने दान की वापसी के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि भक्तों से मिले धन का हिसाब सार्वजनिक और पारदर्शी होना चाहिए। उन्होंने मंदिर ट्रस्ट की संरचना और प्रबंधन में बदलाव की मांग भी उठाई है। ये सिंह के राजनीतिक और सार्वजनिक दावे हैं; इन पर अंतिम निष्कर्ष जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा।
सिंह ने यात्रा को गैर-राजनीतिक बताते हुए कहा है कि इसमें किसी राजनीतिक दल के झंडे नहीं होंगे और राम मंदिर में दान देने वाले श्रद्धालु इसमें शामिल हो सकते हैं। हालांकि, वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और यात्रा में दान के साथ मतदाता सूची तथा कथित ‘वोट चोरी’ का मुद्दा भी शामिल है, इसलिए इसके राजनीतिक प्रभाव पर चर्चा होना स्वाभाविक है। यात्रा को पूरी तरह गैर-राजनीतिक मानना या राजनीतिक अभियान कहना अलग-अलग पक्षों की व्याख्या हो सकती है।
उज्जैन से अयोध्या तक का रास्ता
यात्रा मध्य प्रदेश के कई इलाकों से होकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश करेगी। प्रकाशित कार्यक्रम के अनुसार, संभावित मार्ग में शाजापुर, सारंगपुर, राजगढ़, चाचौड़ा, आरोन, अशोकनगर और चंदेरी जैसे स्थान शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में यात्रा ललितपुर क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए झांसी, उरई, कालपी, कानपुर देहात, लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र और बाराबंकी से होकर अयोध्या पहुंचने की योजना है। प्रतिदिन लगभग 15 किलोमीटर पैदल चलने का लक्ष्य बताया गया है। मार्ग और पड़ावों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलाव संभव है।
धार्मिक आस्था और सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल
राम मंदिर में दान देने वाले श्रद्धालुओं के लिए धन के संग्रह, गिनती, बैंक में जमा और उपयोग की स्पष्ट जानकारी भरोसे का महत्वपूर्ण आधार है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही और संस्थागत निगरानी में सुधार जरूरी होंगे। साथ ही, जांच के निष्कर्षों को राजनीतिक आरोपों से अलग रखकर देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यह यात्रा ऐसे समय शुरू हुई है जब राम मंदिर के दान प्रबंधन का मामला आरोपपत्र और अदालत की प्रक्रिया के चरण में है। आने वाले हफ्तों में यात्रा को मिलने वाला समर्थन, ट्रस्ट की ओर से उठाए जाने वाले कदम और अदालत में जांच से जुड़े तथ्यों की स्थिति इस विवाद की दिशा तय करने में अहम होंगे। फिलहाल, कथित दान-चोरी के आरोपों को सिद्ध अपराध नहीं माना जा सकता; अंतिम निष्कर्ष अदालत के निर्णय पर निर्भर करेगा।
