October 20, 2026
high rise buildings at night

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नई दिल्ली: भारत की तेज रफ्तार बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के सामने अब एक अहम औद्योगिक सवाल खड़ा है—क्या देश सुरंग खोदने वाली अत्याधुनिक मशीनें और दूसरे भारी निर्माण उपकरण अपनी जरूरत के मुताबिक खुद बना सकता है? चीन की ओर से टनल बोरिंग मशीनों (TBM) सहित कुछ विशेष निर्माण उपकरणों के निर्यात पर नियंत्रण लगाने के फैसले ने भारत की आयात निर्भरता को फिर चर्चा में ला दिया है। इसी बीच केंद्र सरकार निर्माण और बुनियादी ढांचा उपकरणों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए लगभग 1.2 अरब डॉलर की योजना को अंतिम रूप देने की दिशा में बढ़ रही है।

यह मामला केवल चीन से मशीनें खरीदने या न खरीदने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध मेट्रो रेल, राजमार्ग, रेलवे सुरंगों, जल परियोजनाओं और खनन जैसे क्षेत्रों में उपकरणों की समय पर उपलब्धता से है। यदि महत्वपूर्ण मशीनें या उनके पुर्जे विदेशों में बने हों और निर्यात अनुमति, सीमा शुल्क या आपूर्ति शृंखला में बाधा आ जाए, तो परियोजनाओं की लागत और समय-सारणी पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि चीन के नए नियंत्रणों से भारत की सभी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं रुक जाएंगी। असर उपकरण के प्रकार, संबंधित निर्यात लाइसेंस और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की उपलब्धता पर निर्भर करेगा।

चीन के नए नियंत्रण क्या हैं?

रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने 19 अक्टूबर 2026 को टनल बोरिंग मशीनों और कुछ अन्य निर्दिष्ट भारी उपकरणों के निर्यात पर नियंत्रण की घोषणा की, जो 18 नवंबर से प्रभावी होने वाले हैं। इसके तहत संबंधित निर्यातकों को निर्धारित मशीनों के लिए लाइसेंस संबंधी नियमों का पालन करना होगा। सूची में TBM के अलावा कुछ प्रकार की वॉकिंग एक्सकेवेटर मशीनें और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली विशेष वेट शॉटक्रीट मशीनें भी शामिल बताई गई हैं। चीन ने इन नियंत्रणों को राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के संदर्भ में रखा है।

निर्यात नियंत्रण का अर्थ हर स्थिति में पूर्ण प्रतिबंध नहीं होता। इसका मतलब यह हो सकता है कि निर्दिष्ट उपकरणों की बिक्री या निर्यात के लिए अनुमति लेना जरूरी हो। व्यावहारिक प्रभाव इस बात से तय होगा कि कौन-सी मशीनें नियमों के दायरे में आती हैं, लाइसेंस कितनी जल्दी मिलते हैं और संबंधित आपूर्ति किस देश या उत्पादन इकाई से हो रही है।

भारत की निर्भरता कहां सामने आई?

टनल बोरिंग मशीनें मेट्रो रेल, लंबी रेल सुरंगों, भूमिगत परिवहन और कुछ जल व सड़क परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये मशीनें जमीन के भीतर बड़े व्यास की सुरंग खोदने के साथ-साथ कई स्थितियों में सुरंग की दीवारों को सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया में भी सहायता करती हैं। इन्हें तैयार करना केवल भारी धातु का ढांचा बनाने का काम नहीं है; इसके लिए उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग, सटीक नियंत्रण प्रणाली, हाइड्रोलिक्स, कटिंग उपकरण, सुरक्षा प्रणालियां और लंबे समय का तकनीकी अनुभव चाहिए।

भारत में पहले भी चीन के सीमा शुल्क और मंजूरी प्रक्रियाओं से जुड़ी देरी ने कुछ परियोजनाओं के लिए आवश्यक मशीनों की उपलब्धता पर सवाल उठाए थे। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसे बड़े प्रोजेक्ट के लिए जरूरी कुछ मशीनें जर्मन कंपनी Herrenknecht की थीं, लेकिन उनका निर्माण चीन स्थित इकाइयों में हुआ था। इससे एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आया: मशीन का ब्रांड जर्मन हो सकता है, पर यदि उसका निर्माण या कोई अहम घटक चीन में निर्भर है, तो आपूर्ति पर चीन की नीतियों का असर पड़ सकता है।

उपलब्ध व्यापार आंकड़ों के अनुसार, चीन से भारत आने वाली टनलिंग मशीनरी का आयात 2022-23 में करीब 1.8 करोड़ डॉलर था। यह 2023-24 में लगभग 30 लाख डॉलर और 2024-25 में करीब 5 लाख डॉलर तक गिरा, जबकि 2025-26 में लगभग 8 लाख डॉलर तक बढ़ा। ये आंकड़े व्यापार में उतार-चढ़ाव दिखाते हैं, लेकिन परियोजनाओं में देरी की पूरी लागत या चीन पर निर्भरता का संपूर्ण आकलन नहीं करते।

क्या भारत के हाईवे और मेट्रो प्रोजेक्ट रुक सकते हैं?

उद्योग से जुड़े लोगों के आकलन के अनुसार, भारत पारंपरिक निर्माण उपकरणों के कई हिस्सों में घरेलू उत्पादन क्षमता रखता है और कुछ विशेष मशीनों के लिए वैकल्पिक देशों से आयात भी संभव है। इसलिए चीन के नियंत्रणों को सभी राजमार्ग या निर्माण परियोजनाओं के लिए तत्काल संकट के रूप में देखना सही नहीं होगा। लेकिन अत्याधुनिक टनलिंग उपकरण, भारी क्रेन, उच्च क्षमता वाले इंजन और कुछ विशिष्ट घटक ऐसे क्षेत्र हैं जहां आपूर्ति में बाधा परियोजना की गति को प्रभावित कर सकती है।

किसी परियोजना पर वास्तविक असर जानने के लिए यह देखना होगा कि मशीन का ऑर्डर दिया जा चुका है या नहीं, निर्माण किस देश में हुआ है, निर्यात लाइसेंस की जरूरत पड़ती है या नहीं, और क्या समान तकनीकी क्षमता वाला विकल्प समय पर उपलब्ध है। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में मशीन की देरी केवल खरीद की तारीख नहीं बदलती; इससे श्रमिकों, ठेकेदारों, निर्माण चरणों और वित्तीय लागतों की योजना भी प्रभावित हो सकती है।

भारत की प्रस्तावित 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना

केंद्र सरकार निर्माण और बुनियादी ढांचा उपकरणों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए लगभग 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना पर काम कर रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, सात वर्षों में इस योजना से लगभग 1.8 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य है। प्रस्तावित दायरे में टनल बोरिंग मशीनों से लेकर अग्निशमन उपकरण और ऊंची इमारतों में इस्तेमाल होने वाली लिफ्ट जैसी मशीनें शामिल हो सकती हैं। योजना का उद्देश्य उन उपकरणों के घरेलू उत्पादन को मजबूत करना है जिनके लिए भारत अब भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है।

योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रोत्साहन राशि का इस्तेमाल केवल मशीनों की अंतिम असेंबली के लिए होता है या फिर उच्च मूल्य वाले पुर्जों, डिजाइन, अनुसंधान, नियंत्रण प्रणाली और तकनीकी कौशल विकसित करने में भी मदद मिलती है। यदि किसी मशीन का अधिकांश महत्वपूर्ण हिस्सा आयातित हो और देश में केवल जोड़ने का काम किया जाए, तो बाहरी आपूर्ति बाधित होने पर निर्भरता बनी रह सकती है।

स्थानीय निर्माण में भारत की मौजूदा स्थिति

भारत में निर्माण उपकरण उद्योग पहले से मौजूद है और घरेलू कंपनियों के साथ कई वैश्विक निर्माता भी यहां उत्पादन करते हैं। लेकिन अलग-अलग मशीनों में स्थानीयकरण का स्तर एक जैसा नहीं है। उद्योग से जुड़े विश्लेषणों के अनुसार, निर्माण उपकरण क्षेत्र में कुल स्थानीयकरण लगभग 50 प्रतिशत के आसपास है। बैकहो लोडर जैसे उपकरणों में घरेलू हिस्सेदारी 85 से 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जबकि एक्सकेवेटर में यह लगभग 55 से 60 प्रतिशत बताई जाती है। हाइड्रोलिक्स, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण, अंडरकैरिज और कुछ विशेष पावरट्रेन जैसे उच्च मूल्य वाले घटकों में आयात पर निर्भरता बनी हुई है।

सरकारी कंपनी BEML ने TBM निर्माण की दिशा में योजनाएं बनाई हैं। Larsen & Toubro और अन्य उपकरण निर्माता भी घरेलू औद्योगिक क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन इन कंपनियों के लिए तकनीकी साझेदारी, प्रशिक्षित इंजीनियर, परीक्षण सुविधाएं, विश्वसनीय स्थानीय आपूर्तिकर्ता और पर्याप्त ऑर्डर जरूरी होंगे। केवल वित्तीय प्रोत्साहन देने से अत्याधुनिक मशीनों की तकनीकी क्षमता तुरंत विकसित नहीं हो जाती।

घरेलू मांग भारत के लिए अवसर क्यों है?

भारत में राजमार्ग, मेट्रो रेल, माल ढुलाई गलियारे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, रेलवे सुरंगें और खनन परियोजनाएं निर्माण उपकरणों की बड़ी मांग पैदा कर रही हैं। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत में खनन और निर्माण उपकरणों की घरेलू मांग 2025 में लगभग 17 अरब डॉलर थी और इसमें सालाना 10 से 12 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान जताया गया है। मांग में यह बढ़ोतरी घरेलू निर्माताओं को निवेश, उत्पादन क्षमता और अनुसंधान बढ़ाने के लिए बाजार उपलब्ध करा सकती है।

खनन क्षेत्र में भी उपकरणों की जरूरत बढ़ सकती है। महत्वपूर्ण खनिजों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने, बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी आपूर्ति शृंखला विकसित करने तथा खदानों की उत्पादकता सुधारने के लिए ड्रिलिंग मशीन, एक्सकेवेटर, डंप ट्रक, क्रशिंग सिस्टम और डिजिटल फ्लीट प्रबंधन तकनीक की जरूरत होती है। यदि घरेलू निर्माता विश्वसनीय मशीनें प्रतिस्पर्धी कीमत पर बना सकें, तो उन्हें भारतीय बाजार के साथ निर्यात के अवसर भी मिल सकते हैं।

निर्यात बाजार में भी बड़ी संभावना

भारत का खनन और निर्माण उपकरण निर्यात पिछले दशक में बढ़ा है। उद्योग रिपोर्टों में 2025 के लिए लगभग 4.9 अरब डॉलर के निर्यात का अनुमान दिया गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र और दक्षिण अमेरिका जैसे बाजारों में सड़क, शहरी परिवहन, ऊर्जा और खनन परियोजनाओं के कारण उपकरणों की मांग बनी रहती है। लेकिन इन बाजारों में स्थायी जगह बनाने के लिए केवल कम कीमत पर्याप्त नहीं होगी। मशीनों की गुणवत्ता, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, बिक्री के बाद सेवा, स्थानीय तकनीकी सहायता और वित्तपोषण भी अहम हैं।

उद्योग से जुड़े दीर्घकालिक अनुमानों में 2047 तक वैश्विक निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रखी गई है। यह लक्ष्य संभावित अवसर को दिखाता है, लेकिन इसे सुनिश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता। इसके लिए तकनीकी क्षमता, उत्पादन का पैमाना, गुणवत्ता मानक और विदेशों में सेवा नेटवर्क का लगातार विकास जरूरी होगा।

भारत के लिए असली चुनौती: आयात बदलना नहीं, क्षमता बनाना

चीन के नए निर्यात नियंत्रण ने एक पुरानी कमजोरी को उजागर किया है: भारत की बुनियादी ढांचा महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप हर उच्च-तकनीकी उपकरण देश में उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका समाधान केवल चीन से खरीद घटाकर किसी दूसरे देश से आयात बढ़ाना नहीं है। इससे स्रोत बदल सकता है, निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं होती। वास्तविक आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण पुर्जों, डिजाइन, सॉफ्टवेयर, नियंत्रण प्रणाली, अनुसंधान और कुशल मानव संसाधन में घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी।

प्रोत्साहन योजना को स्पष्ट स्थानीयकरण लक्ष्य, दीर्घकालिक सरकारी खरीद नीति, उद्योग-अकादमिक सहयोग, परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं तथा स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के विकास से जोड़ना जरूरी होगा। सरकार और उद्योग के सामने चुनौती यह भी है कि घरेलू निर्माण लागत और गुणवत्ता दोनों में प्रतिस्पर्धी हो। यदि मशीनें महंगी, कम विश्वसनीय या सेवा के लिहाज से कमजोर रहीं, तो परियोजना संचालक स्थापित विदेशी ब्रांडों को प्राथमिकता दे सकते हैं।

निष्कर्ष

चीन के टनल बोरिंग मशीनों और अन्य विशेष उपकरणों पर निर्यात नियंत्रण ने भारत को अपनी औद्योगिक क्षमता की समीक्षा करने का एक और कारण दिया है। निकट भविष्य में इसका असर मशीन-विशेष, आपूर्तिकर्ता और परियोजना की जरूरतों पर निर्भर करेगा; व्यापक निर्माण गतिविधियों के ठप पड़ने का निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता। लंबी अवधि में भारत के लिए अवसर बड़ा है—बढ़ती घरेलू मांग को ऐसी विनिर्माण क्षमता में बदलना जो देश की परियोजनाओं को भरोसेमंद उपकरण दे और वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सके।

अंततः सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत अपनी मशीनें कब बनाएगा, बल्कि यह है कि क्या वह उनके सबसे महत्वपूर्ण पुर्जे, तकनीक और सेवा व्यवस्था भी अपने औद्योगिक तंत्र में विकसित कर पाएगा। इसी से तय होगा कि स्वदेशी निर्माण की पहल वास्तविक आपूर्ति-सुरक्षा बनेगी या केवल आयात के स्रोत बदलने तक सीमित रह जाएगी।

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